बिहार में मुद्दों पर भारी जातीय गोलबंदी! PMCH विवाद से लेकर एनकाउंटर तक, हर घटना पर चढ़ने लगा सियासत का रंग

बिहार में मुद्दों पर भारी जातीय गोलबंदी! PMCH विवाद से लेकर एनकाउंटर तक, हर घटना पर चढ़ने लगा सियासत का रंग
पटनाः बिहार की राजनीति इन दिनों जातीय संकीर्णता की भेंट चढ़ते दिख रही है। प्रतिकितिवादी तत्व जातीय आवरण में हर मामलों को उलझा कर लोकतंत्र के असल मकसद को दूर दूर तक नहीं समझ पा रहे हैं। स्थिति यह है कि घटना कुछ भी हो जातीय आवरण में विरोध को महज विरोध का औजार बनाते जा रहे हैं। जातीय राजनीति में कैसे उलझ रहा है बिहार, समझते हैं।

पीएमसीएच प्राचार्य प्रकरण


बिहार के पटना मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रभारी प्रिंसिपल डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह को हटाए जाने के मामले पर भी जातीय रंग चढ़ाया जाना शुरू हो गया है। स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार की ओर से की गई प्रशासनिक कार्रवाई को एक तरफ डॉ. सिंह 'तानाशाही' और 'साजिश' करार देते हुए अपने जले हुए पेट दिखा रहे हैं। वे मंत्रीबौर सचिव पर फोन नहीं उठाने की बात भी कह रहे हैं।
वहीं दूसरी और सोशल मीडिया पर राज्य में जातीय समीकरण और सवाल उठाए जा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इस कार्रवाई को लेकर एक वर्ग की ओर से इसे एक खास जाति के अधिकारी को निशाना बनाने के रूप में प्रचारित किया जाने लगा है। इस संदर्भ में नीट छात्रा रेप- मौत केस में चर्चा में आए प्रभात हॉस्पिटल के मालिक डॉ. सतीश सिंह की चर्चा शुरू हो गई है। कहा जा रहा है कि 6 जनवरी 2026 को पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में नीट की तैयारी कर रही जहानाबाद की छात्रा के साथ हुई रेप के मामले में प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल के मालिक को जबरन घसीटा गया था। प्रभात हॉस्पिटल की नर्स रितु कुमारी के उस बयान पर जिसने उन्होंने कहा था कि स्टाफ और जूनियर डॉक्टरों में बात फैल गई थी कि ये रेप का मामला है। तब भी यह आरोप लगाया गया कि एक खास जाति को परेशान किया जा रहा है।

भरत तिवारी एनकाउंटर


भोजपुर में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर भी जातीय तनाव पैदा करने की कोशिश हो रही है। इसको लेकर राजनीति और समाज में गहरी जातीय गोलबंदी देखने को मिल रही है। इस मुद्दे को लेकर राज्य में सवर्ण बनाम दलित-पिछड़ा की पारंपरिक राजनीति के रूप में उभार कर गलत दिशा देने की कोशिश हो रही है। यह तब हो रहा है जब बिलौटी गांव में पिछडी जाति और दलित जाति के युवक भरत तिवारी का गुणगान करते थक नहीं रहे हैं। वे भरत तिवारी को जातीय घेरे में रख कर कभी बात करना भी नहीं चाहते। पर भरत तिवारी के ब्राह्मण समुदाय से होने के कारण, कई सवर्ण संगठन और स्थानीय लोग इस एनकाउंटर को फर्जी बताकर सड़क पर उतर कर स्थानीय सभी जातियों के नायक भरत तिवारी को जातीय संकीर्णता की और धकेलने में लगे हैं।

हरा गमछा मामला


राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की ओर से एआई समिट के दौरान बतौर उदाहरण हरा गमछा क्या बोल दिया, एक जाति या पार्टी विशेष के लोगों ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। दरअसल, पटना में एक एआई समिट के दौरान सीएम ने कहा था कि यदि संदिग्ध अपराधियों को पकड़ना हो, तो एआई कैमरों को सिर्फ "हरा गमछा" वालों को पकड़ने का निर्देश देने पर वह तुरंत उन्हें दबोच लेगा। इस वक्तव्य का जातीय आवरण में राजनीतिक निहितार्थ निकाल कर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर करारा हमला शुरू कर दिया गया।

जाति विशेष का एनकाउंटर


गृह विभाग की ओर से शुरू किए गए एनकाउंटर अभियान पर भी जातीय आरोप लगा। तेजस्वी यादव ने सम्राट सरकार पर एक खास जाति के एनकाउंटर का आरोप लगाया। भाई वीरेंद्र ने तो इस आरोप के साथ साथ एक सूची जारी कर यह बताने की भी कोशिश की कि अब तक कितने यादव अपराधी का एनकाउंटर या हॉफ एनकाउंटर हुआ है।

जाति शॉर्ट कट रास्ता: अश्क


वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश अश्क का मानना है कि बिहार अभी जातीय तुष्टिकरण की राजनीति से नहीं उभरा है। टिकट पाना हो तो,मंत्री बनना हो तो परीक्षा या अपरोक्ष रूप से जाति बल दिखाना पड़ता है। ठीक जब दबाव की राजनीति को आगे बढ़ाना होता है तब भी जातीय राजनीति होती है। यहां तक कि पुलिसिया कार्रवाई को भी जातीय आवरण में देखा जा रहा है। जातीय जमावड़े हो रहे हैं। तस्वीर या ऑडियो वीडियो जारी किए जा रहे हैं। ऐसे में जाति का एक छोटा वर्ग ही खड़ा हो कर सोशल मीडिया पर अपनी बात जातीय रंग के मोलम्मे में कह कर ऐन केन प्रकारेण अपने पक्ष में फैसला भी चाहता है। मामला एनकाउंटर का हो या फिर नीट छात्रा का रेप या फिर पीएमसीएच के प्रिसिपल पर हुई कार्रवाई का। जातीय रंग से कोई घटना नहीं बच पाया। ऐसा इसलिए कि यह एक शॉर्टकट रास्ता है।
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