कैग की रिपोर्ट में यह सामने आया है। अनुसूची 11 और12 के तहत सौंपे गए विषयों से संबंधित राशि और कर्मचारियों का विधिवत हस्तांतरण स्थानीय निकायों को नहीं किया गया। इससे पंचायतें केवल कार्यान्वयन एजेंसी बनकर रह गई।
रिपोर्ट में पाया गया कि राशि सीधे पंचायतों या नगरीय निकायों के खाते में नहीं डाली गई। भुगतान और आहरण का अधिकार विभागीय अफसरों ने अपने पास ही रखा। इस वजह से स्थानीय निकायों को वित्तीय निर्णय लेने की स्वतंत्रता नहीं मिली।
स्कूल शिक्षा से जुड़े मामलों में भी विद्यालय का भवन, भूमि, चल-अचल संपत्ति और स्टाफ का पूर्ण हस्तांतरण पंचायतों और नगरीय निकायों को नहीं किया गया। जबकि विभाग इस हस्तांतरण का दावा करता रहा।
संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत
यह स्थिति संविधान के 73 वे संशोधन की भावना के विपरीत रही है, जिसमें पंचायतों को स्वशासी इकाई के रूप में कार्य करने के लिए विषय, कर्मचारी और बजट तीनों सौंपने का प्रावधान है। प्रदेश में स्थानीय निकायों को बजट ट्रांसफर न किए जाने से यह बात सामने आई कि यदि बजट नियंत्रण स्कूल शिक्षा जैसे विभाग अपने पास रखेंगे तो पंचायतों कैसे स्वायत्त होंगी। सवाल ये भी उठे हैं कि बिना अधिसूचना और पालन प्रतिवेदन के हस्तांतरण को कैसे हो गया।
क्या था 73 वें संविधान संशोधन में
73 वें संविधान संशोधन के अनुसार स्थानीय निकाय और पंचायत एवं नगरीय निकायों को पंचायत अधिनियम 1993 के व नगरीय निकायों को पंचायत अधिनियम 1993 व नगरीय निकाय अधिनियम 1956 एवं 1961 के तहत स्वतंत्र सरकार के रूप में कार्य करने के लिए संविधान में जोड़ी गई अनुसूची 11 एवं 12 के तहत विषय स्थानीय निकायों को दिए गए थे, जिनमें विभाग कार्यालय, विद्यालय, अधोसंरचना, चल-अचल संपत्तियां स्टाफ तथा फंड का 1995 से 2018 तक विधिवत रूप से स्थानांतरण स्थानीय निकायों को विभागों द्वारा नहीं किया गया।











