दरअसल कांग्रेस जाति जनगणना की मांग और राज्य में एससी/एसटी अत्याचारों का मुद्दा उठाने के साथ इसे 'वर्गीय जंग' बनाने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने सत्ता में आने पर 500 रुपये में एलपीजी सिलेंडर सहित कई योजनाओं का भी वादा किया है। बीजेपी ने पार्टी के लिए नेतृत्व के खेल को खुला रखते हुए तीन केंद्रीय मंत्रियों और चार सांसदों को मैदान में उतारा है। पार्टी को उम्मीद है कि वरिष्ठ नेता न केवल अपनी सीटें जीतेंगे, बल्कि पार्टी को अपने क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करने में भी मदद करेंगे।
ओबीसी पर कांग्रेस-बीजेपी की नजर
राज्य में 45 फीसदी ओबीसी आबादी के साथ, कांग्रेस ओबीसी कार्ड खेल रही है और पार्टी सत्ता में आने पर जातिगत जनगणना का वादा कर रही है। कांग्रेस ने 62 ओबीसी उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। बीजेपी ने 40 ओबीसी उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जबकि 90 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की जानी बाकी है। बीजेपी, कांग्रेस के ओबीसी उम्मीदवारों की संख्या को पार करने के लिए तैयार है।बीजेपी का ओबीसी जातियों से वोट हासिल करने के लिए पूरा फोकस पीएम विश्वकर्मा योजना पर रहा है। ओबीसी के अलावा, दोनों पार्टियां आदिवासी मतदाताओं पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं और यहीं पर असली लड़ाई हो रही है। 47 एसटी आरक्षित सीटों में से कांग्रेस ने 2018 में 31 सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी ने 16 सीटें जीती थीं। दोनों दलों के वरिष्ठ नेता आदिवासी क्षेत्रों में प्रचार कर रहे हैं।











