मध्य प्रदेश का बड़ा मुद्दा : गांव-गांव कैसे चलें बस, लोक परिवहन की दरकार

मध्य प्रदेश का बड़ा मुद्दा : गांव-गांव कैसे चलें बस, लोक परिवहन की दरकार
 भोपाल। लोगों के अच्छे स्वास्थ्य की बात हो या शिक्षा और रोजगार की। इन सब में कोई राज्य तभी आगे निकल सकता है जब लोक परिवहन की सुविधा दुरुस्त हो। सस्ती, सुगम, सुरक्षित और त्वरित परिवहन की सुविधा उन्हें मिल सके। प्रदेश की बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करती है। उन्हें उपचार के लिए आयुष्मान योजना की सुविधा मिल रही है। आरटीई के अंतर्गत अच्छी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की सुविधा भी मिलती है, पर कहीं आने-जाने के लिए वह निजी बस या अन्य साधनों में मनमानी किराया देने को मजबूर हैं।

लोक परिवहन के माध्यम से गांव-गांव तक बसें चलाने की आवश्यकता है। यह तभी संभव है जब सरकार हर स्तर पर परिवहन की सुविधा उपलब्ध कराए। लोक परिवहन के क्षेत्र में काम कर रहे जानकारों का कहना है कि रोड ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन एक्ट में साफ लिखा है कि, 'नो प्राफिट, नो लास' के आधार पर आमजन को परिवहन सुविधा मिलनी चाहिए, पर मध्य प्रदेश में ऐसा नहीं हो रहा है। सरकार स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा इसी आधार पर उपलब्ध करा रही है।

एक कल्याणकारी राज्य में परिवहन सुविधा भी इसी प्रकार से मिलनी चाहिए। यही कारण है मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को छोड़कर सभी राज्यों में लोक परिवहन के सरकार के हाथ में है। मप्र में सरकार ने राज्य परिवहन निगम को दो जनवरी 2005 को बंद करने की घोषणा की थी। 2010 के बाद से बसों का संचालन बंद हो गया था।

इसके पीछे सरकार का तर्क था किक बस चलाने में घाटा हो रहा है, जबकि उन्हीं रूटों पर निजी आपरेटर अब कमाई कर रहे हैं। प्रदेश में 15 हजार बसों को मिलाकर लगभग डेढ़ लाख वाहनों का संचालन निजी आपरेटर कर रहे हैं। उनकी निगरानी ठीक से नहीं होने के कारण वह परमिट किसी और रूट की लेते हैं पर वाहन अधिक लाभ वाले रूट पर चलाते हैं।


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