*गुरु के भक्त रहो पर अंधभक्त मत बनो*
*सिर्फ तीर्थंकर के भक्त बनो अंधभक्ति भी उन्ही से रखो*
गुरु (साधु साध्वी संत आचार्य) का आदर करो उनको नमन करो उनकी कहीं शिक्षा का पालन करो उनके भक्त रहो पर अंधभक्त मत बनो,उन्हें सीधा सीधा भगवान का दर्जा ना दीजिए।
*भगवान महावीर की शिक्षा धार्मिक क्रिया और जैन धर्म पालन का तरीका एक ही था,* लेकिन धीरे-धीरे गुरूओ ने उसकी अलग-अलग तरीके बता दिए और यह साबित कर दिया कि वे जो कह रहे है वही सही है।
*आज यह हालत है कि पर्यूषण पर्व संवत्सरी और कभी-कभी तो महावीर जयंती की तिथिया भी अलग-अलग निकाल दी।*
*भगवान महावीर की जीवनी भी अलग-अलग लिख दी।* भगवान की पूजा भक्ति आराधना सब के रंग रूप अलग-अलग कर दिए। कहने को सभी संत आचार्य अपने आपको जैन मुनि कहते हैं परंतु सभी अलग-अलग स्वरूप में रहते हैं और इसी कारण जैन समाज बटता जा रहा हैं।
*कई आचार्य अपने आप को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और उनकी इसी मगन मस्ती ने जैन समाज को दिगंबर श्वेतांबर मंदिर स्थानक बिस पंथ तेरापंथ खतरगच्छ जैसे कई टुकड़ो मैं बिखेर दिया है।*
लोगों के मन में यह मलाल है कि जैन समाज में इतनी अलग-अलग समाचारी क्यों है एक समान सभी क्रियाएं क्यों नहीं है।
यदि सभी जैन आचार्य साधु संत साध्वी धार्मिक तौर-तरीकों पर नहीं तो कम से कम *सामाजिक तौर पर एकमत के नहीं हुए तो आने वाले समय में जैन समाज खंडित होता जाएगा* और जैन कौम बड़ी दुविधा में आ जाएगी।
अशोक मेहता, इंदौर (लेखक, पत्रकार, पर्यावरणविद्)
(ये लेखक के अपने विचार हैं)











