तब अंग्रेज और बड़े आदमी पीते थे चाय, ब्रुक बॉन्‍ड ने बदल दिया बाजार का गणित, ऐसे बनाया दबदबा

तब अंग्रेज और बड़े आदमी पीते थे चाय, ब्रुक बॉन्‍ड ने बदल दिया बाजार का गणित, ऐसे बनाया दबदबा
नई दिल्‍ली: भारत में चाय सिर्फ एक पेय पदार्थ नहीं है। यह रोजमर्रा की जिंदगी, रिश्तों और संवाद की अटूट कड़ी है। साल 1903 में ब्रिटिश काल के दौरान भारत में कदम रखने वाले ब्रुक बॉन्ड ने इस साधारण सी आदत को देश के सबसे बड़े पैक्ड ब्रांड्स में से एक बना दिया। हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (एचयूएल) के तहत काम करने वाले ब्रुक बॉन्ड (खासतौर रेड लेबल) ने सिर्फ स्वाद और क्‍वालिटी के दम पर ही नहीं, बल्कि 'स्वाद अपनेपन का' और 'टेस्‍ट ऑफ टुगेदरनेस' जैसे कैंपेन के जरिए देश के हर वर्ग के दिल में अपनी खास जगह बनाई है।

20वीं सदी की शुरुआत में भारत में चाय मुख्‍य तौर पर ब्रिटिश अधिकारियों और कुलीन वर्ग तक सीमित थी। खुली चाय पत्ती का बाजार हावी था। ऐसे समय में 1903 में ब्रुक बॉन्ड ने भारत में एंट्री की। डोर-टू-डोर सैंपलिंग, रेलवे स्टेशनों और किराना दुकानों पर चाय के स्टॉल लगाकर लोगों को चाय की आदत से जोड़ा। 1930 के दशक तक यह ब्रांड हर घर की पहचान बन चुका था। एचयूएल के मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का फायदा उठाकर ब्रांड ने गांव की छोटी दुकानों से लेकर आधुनिक सुपरमार्केट्स और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्‍स तक अपनी पहुंच बनाई।

भारतीयों के कड़क स्वाद को ध्यान में रखकर ब्रुक बॉन्ड ने स्ट्रॉन्ग ब्लैक टी ब्लेंड तैयार किया। क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को देखते हुए उत्तर और दक्षिण भारत के लिए अलग-अलग SKU (स्टॉक कीपिंग यूनिट्स) और छोटे पैक से लेकर पारिवारिक डिब्बों तक की रेंज उतारी गई। इसके अलावा, हेल्‍थ और इम्युनिटी को प्राथमिकता देकर 'रेड लेबल नेचुरल केयर' लॉन्च किया गया। इसमें तुलसी, अदरक और इलायची जैसे आयुर्वेदिक तत्व शामिल किए गए। कोरोना महामारी के दौरान वेलनेस पर फोकस्‍ड इस प्रोडक्ट को ग्राहकों का जबरदस्त समर्थन मिला।

रेड लेबल की सबसे बड़ी यूएसपी इसकी ऐड स्‍ट्रैटेजी और पर्पज ड्रिवन मार्केटिंग रही है। 'स्वाद अपनेपन का' टैगलाइन के तहत ब्रांड ने रूढ़िवादिता, अंतर-धार्मिक सौहार्द, जातिगत दूरियों और एलजीबीटीक्यू कम्‍युनिटी की स्वीकार्यता जैसे संवेदनशील सामाजिक मुद्दों को चाय के कप के जरिए दिखाया। बिना किसी बड़े सेलिब्रिटी एम्बेसडर के आम जिंदगियों और रिश्तों की सच्ची कहानियों पर फोकस करके ब्रांड ने ग्राहकों के साथ एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव स्थापित किया।

वाघ बकरी जैसे क्षेत्रीय ब्रांड्स, ग्रीन टी/हर्बल टी की बढ़ती मांग और वैल्‍यू सेंसिटिविटी जैसी चुनौतियों के बावजूद ब्रुक बॉन्ड ने क्षेत्रीय स्वाद के अनुसार कस्टम ब्लेंड्स और किफायती मिनी-पैक्स बनाकर अपना दबदबा बनाए रखा। 2,000 से 2,500 करोड़ रुपये से ज्‍यादा के सालाना टर्नओवर के साथ यह आज भारत के टॉप 3 पैक्ड टी ब्रांड्स में शामिल है। ब्रुक बॉन्ड की यह यात्रा साबित करती है कि सही डिस्ट्रीब्यूशन, लगातार क्‍वालिटी और भावनात्मक जुड़ाव के दम पर किसी भी वस्तु को देश की सांस्कृतिक पहचान बनाया जा सकता है।

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