भारत का अपनी पॉलिसी पर रुख काफी साफ और रणनीतिक रहा है। इसे वह सिर्फ एक व्यापारिक विवाद के तौर पर नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक संप्रुभता और 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' के तौर पर देखता है।
पिछले साल दिसंबर में चीन ने विवाद पर आपसी सहमति से कोई समाधान निकालने के लिए अर्जी दी थी। हालांकि, विवाद पर आपसी सहमति से कोई समाधान नहीं निकला। इसके बाद फिर ताजा अपील की गई है।
आपसी सहमति से समाधान निकालने के मकसद से 10 फरवरी, 2026 को ये बातचीत हुई थी।
विश्व व्यापार संगठन (WTO) के एक संदेश में कहा गया है, 'दुर्भाग्य से, ये बातचीत विवाद को सुलझाने में फेल रही। इसलिए, चीन ने एक पैनल गठित करने के लिए...अनुरोध प्रस्तुत किया है।'
आपसी सहमति से समाधान निकालने के मकसद से 10 फरवरी, 2026 को ये बातचीत हुई थी।
विश्व व्यापार संगठन (WTO) के एक संदेश में कहा गया है, 'दुर्भाग्य से, ये बातचीत विवाद को सुलझाने में फेल रही। इसलिए, चीन ने एक पैनल गठित करने के लिए...अनुरोध प्रस्तुत किया है।'
चीन का आरोप क्या है?
चीन ने आरोप लगाया है कि भारत की ओर से कुछ तकनीकी उत्पादों पर लगाए गए टैरिफ या आयात शुल्क, और आयातित सामानों के बजाय घरेलू उत्पादों के इस्तेमाल जैसे उपाय चीनी सामानों के साथ भेदभाव करते हैं।चीन इन क्षेत्रों के तहत आने वाले सामानों का एक प्रमुख निर्यातक है। उसने दावा किया था कि ये सहायता उपाय और प्रोत्साहन डब्ल्यूटीओ के 'जनरल एग्रीमेंट्स ऑन टैरिफ एंड ट्रेड्स 1994' (GATT 1994), 'सब्सिडी और काउंटरवेलिंग उपायों पर समझौता' और 'व्यापार-संबंधित निवेश उपायों पर समझौता' से जुड़े नियमों का उल्लंघन करते हैं।भारत का पूरे मामले में रुख क्या है?
- भारत इस मामले में कड़ा रुख अपनाए हुए है।
- वह अपनी PLI योजनाओं और सब्सिडी का बचाव करता है।
- इसे वह भेदभावपूर्ण नहीं बल्कि 'आत्मनिर्भर भारत' और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी मानता है।
- भारत का तर्क है कि सौर और आईटी जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना उसकी संप्रभुता का हिस्सा है।
- वह चीनी डंपिंग से अपने स्थानीय उद्योगों को बचाने के लिए WTO के नियमों के तहत ही काम कर रहा है।











