बस्तों के बोझ से थक रहे नौनिहाल, लेकिन जिम्मेदारों को परवाह नहीं

बस्तों के बोझ से थक रहे नौनिहाल, लेकिन जिम्मेदारों को परवाह नहीं
भोपाल। स्कूल शिक्षा विभाग ने स्‍कूली बच्‍चों को भारीभरकम बस्‍तों के बोझ से निजात दिलाने के लिए भले ही बैग पालिसी बना दी हो, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी कोई चिंता नहीं हैं। वह अब तक पालिसी का पालन नहीं करा सके हैं और न ही स्कूलों का निरीक्षण शुरू किया है। इसी वजह से पहली कक्षा के नौनिहाल से लेकर 12वीं कक्षा तक के छात्र बस्तों के बोझ तले दबने से थक जाते हैं। वह स्कूल जाने और फिर घर आते समय अधिक वजन वाले बस्तों को लादे हुए इतने थक जाते हैं कि वह पढ़ने की बजाए आराम चाहते हैं। ऐसे में बस्तों के बोझ से थके बच्चे, जब पढ़ने में पिछड़ेंगे तो फिर वह परीक्षा में अव्वल कैसे आएंगे। हैरान करने वाली बात यह है कि कलेक्टर को स्कूल और बच्चों की चिंता हैं, इसी वजह से वह निरंतर निरीक्षण कर रहे हैं, लेकिन डीईओ और डीपीसी सहित अन्य अधिकारियों को किसी तरह की कोई फिक्र नहीं हैं।

हर तीन महीने में करना था औचक निरीक्षण

सभी सरकारी व निजी स्कूलों के विद्यार्थियों के लिए सरकार ने स्कूल बैग में किताबों का वजन तय किया था। यह वजन राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार तय किया गया था । साथ ही सप्ताह में एक दिन बिना बस्ते के पढ़ाई होने के निर्देश हैं। इस संबंध में स्कूल शिक्षा विभाग ने आदेश तक जारी किए थे। इसमें यह तय किया गया था कि जिला शिक्षा अधिकारी हर तीन महीने में औचक निरीक्षण कर बस्ते का वजन देखेंगे। इसके बाद भी जिला शिक्षा अधिकारी ने अब तक किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की है।

जांच होती तो बच्चों का फायदा होता

यदि दिए गए आदेश के अनुसार जिले में नए शिक्षा सत्र शुरू होते ही जिला शिक्षा अधिकारी टीम द्वारा निरीक्षण कराया जाता तो इसका निश्चित रूप से बच्चों को फायदा होता। पहला उनके बस्तों का बोझ तो कम होता ही साथ ही अनावश्यक थोपी गई पुस्तक व कापियों का बोझ उन पर नहीं आता। इसके अलावा स्कूल प्रबंधन मनमानी करते हुए अभिभावकों पर एक ही दुकान से सामग्री खरीदने पर दबाव नहीं बना पाते।

स्वजन बोले थक जाते हैं बच्चे, हम खुद लाते हैं बस्ते

- लांबाखेड़ा के एक बड़े स्कूल की नर्सरी कक्षा में पढ़ने वाली रोकन (परिवर्तित नाम) की मां ने बताया कि बच्ची के बस्ते का बोझ लगभग तीन किलो से अधिक है। मैं खुद उसका बस्ता बस तक लेकर जाती हूं।

- टीलाजमालपुरा में रहने वाले सौरभ (परिवर्तित नाम) के पिता ने बताया कि तीसरी कक्षा में पांच किलो वजनी बस्ता है। बेटा उसको लेकर लाता है और ले जाता है तो उसके चेहरे पर थकान साफ नजर आती है।

 अवधपुरी में रहने वाले उज्जवल (परिवर्तित नाम) की मां ने बताया कि उनके बेटे और बेटी अलग -अलग कक्षा में हैं। उनके बस्तों का वजन लगभग चार किलो तक है। दोनों बच्चे कभी-कभी तो पूरी पुस्तक नहीं ले जा पाते हैं।

यह है नई गाइडलाइन, लेकिन नहीं हो रहा पालन

- प्रत्येक स्कूल को नोटिस बोर्ड एवं कक्षा में बस्ते के वजन का चार्ट प्रदर्शित करना होगा।
- स्कूल डायरी का वजन भी बस्ते के वजन में ही शामिल किया जाए।

- स्कूल बैग हल्के वजन के हों, जो कंधों पर आसानी से फीट हो सके।

- कक्षा दूसरी तक के बच्चों को गृह कार्य नहीं दिया जाएगा।

- तीसरी से पांचवीं तक के बच्चों को प्रति सप्ताह अधिकतम दो घंटे का गृह कार्य दिया जाए।

- छठवीं से आठवीं तक प्रतिदिन एक घंटे और नौवीं से 12वीं तक के छात्रों को प्रतिदिन दो घंटे गृह कार्य दिया जाए।

यह तय किया गया था बस्तों का वजन

कक्षा - वजन की सीमा (किलोग्राम में)

पहली - 1.6 - 2.2

दूसरी - 1.6 - 2.2

तीसरी - 1.7 - 2.5

चौथी - 1.7 - 2.5

पांचवीं - 1.7 - 2.5

छठवीं - 02- 03

सातवीं - 02- 03

आठवीं - 2.5 - 4.0

नौवीं - 2.5 - 4.5

दसवीं - 2.5 -4.5

इनका कहना है

स्कूलों में व्यवस्थाएं सुधारने के लिए निरीक्षण निरंतर किया जा रहा है और अधिकारियों को निर्देश भी दिए गए हैं। वहीं निजी स्कूलों की मनमानी पर पूरी तरह से रोक लगाने आदेश जारी कर दिए हैं। कक्षा के अनुसार बच्चों के बस्तों का वजन पहले से तय हैं इनकी जांच कराने के लिए जिला शिक्षा अधिकारी को निर्देश दिए गए हैं। जल्द ही कार्रवाई शुरू की जाएगी।

- आशीष सिंह, कलेक्टर, भोपाल

स्कूल में बच्चों के बस्तों के वजन की जांच करने के लिए योजना तैयार कर ली गई है। जल्द ही इसके तहत निरीक्षण शुरू किया जाएगा। इस दौरान यदि तय मानक से अधिक बच्चों के बस्तों का वजन निकला और अन्य नियमों का पालन शाला प्रबंधन द्वारा नहीं किया जाना पाया गया तो कार्रवाई की जाएगी।

- अंजनी कुमार त्रिपाठी, जिला शिक्षा अधिकारी, भोपाल

यह बात सही है कि स्कूली बच्चों के बैग को लेकर निरीक्षण करना है, ताकि पता लगाया जा सके कि किसी बच्चे के बैग में निर्धारित से अधिक वजन तो नहीं है। इसमें देरी हुई है, लेकिन निरीक्षण की रणनीति बना ली है। सभी को मिलकर निरीक्षण करना है। समय नहीं मिलने के कारण निरीक्षण में देरी हुई है। प्रयास है कि जिस दिन जो विषय पढ़ाएं जाएं, उन्हीं विषयों से जुड़ी पठन सामग्री बच्चों के बैग में रखी जाए। स्कूलों से यह व्यवस्था बनवाएंगे।
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