उपाध्याय भगवंत ने कहा कि पहले दर्शन और फिर देशना हो। दर्शन से समर्पण भाव आएगा। देशना से ज्ञान भाव आएगा। समर्पण के बिना पाया ज्ञान व्यर्थ हो जाएगा। बिना ज्ञान के किया गया समर्पण अंधविश्वास हो जाएगा। समर्पण और सद्ज्ञान का समन्वय करना चाहिए। देशना श्रवण कर आत्म कल्याण करना है। आत्म कल्याण आलंबन से होना चाहिए। आलंबन नव पद है। अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, दर्शन, ज्ञान,चारित्र्य इन नो पदों में आपकी चर्चा होगी। यह हमारी शुद्ध अवस्था में आने वाला क्रम है। देशना सुनकर सत्य के दर्शन हो तो जीवन में अपनाने की भावना होनी चाहिए।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि सत्य को सत्य मानना यह दर्शन है। सत्य को सत्य जानना और सत्य में जीना चारित्र्य है। सत्य में जीकर अपनी अशुद्धियों को तपाना और शुद्ध होकर निखरना तप है। ये चारों मिलकर साधन है। सत्य को जानो, मानो और जियो। यह मार्ग है साध्य तक पहुंचाने का। साध्य आचार्य, उपाध्याय और साधु पद है। ये साध्य ही दर्शन,ज्ञान और चारित्र्य का उपयोग कर अपने आप को सिद्ध तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। नवपद की आराधना सिद्ध चक्र है। सिद्ध चक्र परम सुख का कारण है। भव चक्र दुख का कारण है। भव चक्र से मुक्त होकर सिद्ध चक्र की आराधना करनी है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि साल में दो बार सिद्ध चक्र से जोड़ा जाता है। दो बार नवपद की आराधना की जाती है। आराधना शुद्ध और भावपूर्वक होनी चाहिए। आराधना केवल करने के लिए नहीं होनी चाहिए। नवपद का स्वरूप समझकर हमने क्या पाया उसे अपने जीवन में अपनाना है। गृहस्थ जीवन में रहकर कई परेशानियां आएंगी लेकिन हमें नवपद की आराधना से सीख लेकर जीवन को आत्म कल्याण की ओर ले जाना है। नवपद आराधना केवल करने मात्र के लिए नहीं बल्कि जीवन का कल्याण करने के लिए है। हमें आत्म कल्याण के पद पर आगे बढ़ना है।











