पंजाबियों के लिए 'सपनों के देश से बुरा सपना' क्यों बन रहा कनाडा, कुछ ही साल में कैसे बदला सबकुछ? समझें

पंजाबियों के लिए 'सपनों के देश से बुरा सपना' क्यों बन रहा कनाडा, कुछ ही साल में कैसे बदला सबकुछ? समझें
ओटावा: पंजाब में युवाओं के बीच कनाडा जाने और वहां काम करना एक सपना रहा है। हालांकि अब ये सपना कमजोर हो रहा है। दरअल जिस सिस्टम के तहत जस्टिन ट्रूडो की लिबरल सरकार बड़ी संख्या में इंटरनेशनल स्टूडेंट और अस्थायी वर्करों को कनाडा लाई थी, वह अब बहुत सख्त हो गया है। काम से जुड़े नियमों को सख्त कर दिया गया है और स्टडी-परमिट की सीमा तय की गई है। साथ ही अस्थायी निवासियों की संख्या कम करने की दिशा में कदम उठाए हैं। ऐसे में मौजूदा मार्क कार्नी सरकार में कनाडा पहले जैसा नहीं रह गया है।

द प्रिंट ने अपने विश्लेषण में बताया है कि कैसे अब कनाडा कुछ साल पहले की तरह पंजाबियों की ड्रीम डेस्टिनेशन नहीं रह गया है। इंटरनेशनल स्टूडेंट की बढ़ती संख्या के पीछे एक अहम वजह पब्लिक-प्राइवेट कॉलेज मॉडल था। इस सिस्टम के तहत प्राइवेट कॉलेज प्रोग्राम चलाते थे, जबकि छात्रों को पब्लिक कॉलेजों से डिग्री या सर्टिफिकेट मिलते थे। यह भारतीय युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हुआ। फिर ओटावा ने इसे खत्म करना शुरू कर दिया। मई 2024 से इन प्रोग्राम में दाखिला लेने वाले स्टूडेंट पोस्ट-ग्रेजुएशन वर्क परमिट (PGWP) के लिए योग्य नहीं रहे।

बदली कनाडा की हकीकत

पंजाबियों का 'कनाडा ड्रीम' लंबे समय से तरक्की, रुतबे और आर्थिक सफलता की निशानी माना जाता था लेकिन अब ये टूट रहा है। घर छोड़ने का मतलब बेहतर जिंदगी की गारंटी नहीं रह गया है। जमीनी हकीकत बदल गई है। गरिमा का सफर इस थका देने वाली सच्चाई को दिखाता है। वह 2018 में 18 साल की उम्र में कनाडा पहुंची थीं।

गरिमा साढ़े छह साल बाद कई कॉलेजों में पढ़ने हफ्ते में 50 घंटे काम करने और अकेलेपन में विनिपेग की कड़ाके की ठंड झेलने के बाद आखिरकार भारत लौट आईं। जालंधर के ही रहने वाले 27 साल के साहिल भी कनाडा के एक बिल्कुल अलग अनुभव के बाद वापस आए। स्थायी निवास (परमानेंट रेजिडेंसी) का सपना पूरा ना होने पर वह लौट आए।

पंजाबियों का कनाडा सपना

साल 2022 तक कनाडा में इंटरनेशनल स्टूडेंट की संख्या में भारी उछाल आया, जिसमें पंजाबियों की बड़ी हिस्सेदारी थी। उस साल जारी किए गए सभी नए स्टडी परमिट में 40% से ज्यादा भारतीय थे। वीजा पाने वाले 2.26 लाख भारतीय स्टूडेंट में से 1.36 लाख पंजाब से थे। इन परिवारों के लिए कनाडा का वीजा बेहतर भविष्य की उम्मीद बन गया।

इमिग्रेशन कंसल्टेंट और एजेंट का एक बड़ा और व्यवस्थित नेटवर्क पंजाब के कनाडा सपने का गेटकीपर बन गया, जो काबिल और मजबूर, दोनों तरह के लोगों की मदद करता था। इसने एक फलते-फूलते 'ग्रे मार्केट' (अनौपचारिक बाजार) को जन्म दिया, जो ऐसे वादों पर टिका था, जिन्हें कनाडाई सिस्टम हमेशा पूरा नहीं कर सकता था।

स्थायी निवास की उम्मीद

परमानेंट रेजिडेंसी पाने के पारंपरिक रास्ते कम होते गए तो कनाडा जाने का दबाव महंगे पैकेज बेचने का एक मौका बन गया। IRCC के डेटा से पता चलता है कि 2022 और 2023 के बीच स्टडी परमिट के लिए आवेदन पाने वाले 603 प्राइवेट डेजिग्नेटेड लर्निंग इंस्टीट्यूशन में से 485 प्राइवेट करियर कॉलेज थे, जो शॉर्ट-टर्म वोकेशनल ट्रेनिंग, डिप्लोमा और ट्रेड सर्टिफिकेट देते थे।
कनाडा के रेगुलेटेड इमिग्रेशन कंसल्टेंट कंवर सिंह सिएरा ने द प्रिंट को बताया कि इस सिस्टम के बढ़ने से रिक्रूटर और प्राइवेट कॉलेज चलाने वालों के लिए कमर्शियल फायदे के मौके बने। उन्होंने आरोप लगाया कि इंटरनेशनल एजुकेशन से जुड़े संस्थानों की संख्या 1,100 से ज्यादा हो गई थी और अनुमान है कि बाद में यह संख्या बढ़कर तकरीबन 1,500 तक पहुंच गई होगी।
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