भोटिया जनजाति मंगोलॉयड विशेषताओं से संबंधित है। यह प्रदेश की प्रमुख जनजातियों में से एक है। प्रदेश के अल्मोड़ा, चमोली, पिथौड़ागढ़ और उत्तरकाशी जिले में इस जनजाति के लोग मुख्य रूप से निवास करते हैं। भोटिया शब्द की उत्पत्ति भोट से हुई है। भोट तिब्बती मूल के लोगों के लिए एक परंपरिक नाम है। यह समुदाय खानाबदोश जीवन गुजारने के लिए जाता है। इस समुदाय के सामाजिक मानदंडों में भी काफी ढील दी गई है। हालांकि, समुदाय की सबसे बड़ी विशेषता है, सामाजिक स्तर पर पुरुषों और महिलाओं को एक समान स्थान दिया जाना।
भोटिया जनजाति की पांच श्रेणियां
भोटिया जनजाति में रंग, जौहरी, तोलचा, मार्चा और जद मुख्य श्रेणियां हैं। तोलचा एवं मार्चा श्रेणी के भोटिया चमोली और जद भोटिया उत्तरकाशी जिले में पाए जाते हैं। रंग और जौहरी भोटिया पिथौरागढ़ जिले में पाए जाते हैं। भोटिया समुदाय मौसम देवता गबला को पूजते हैं। गबला देवता की पूजा के बाद बारिश और बर्फ के खत्म होने की मान्यता है। ये अच्छा मौसम लाते हैं। भोटिया जनजाति के निवास स्थान को लेकर दावा किया जाता है कि सदियों से ये नीती और माणा घाटी में निवास करते हैं। पहले के समय में इन घाटियों के लोग तिब्बत से नमक, ऊन, घी का व्यापार करते थे। इसके बाद यहां गांव-गांव में इसके बदले में खाद्यान्न का आदान-प्रदान होता था। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बत से व्यापार बंद हुआ। इसके बाद ग्रामीण खेतीबाड़ी करने लगे।
युद्ध के बाद बदली स्थिति
भारत-चीन युद्ध के बाद भोटिया जनजाति के लिए चीजें बदल गईं। तिब्बत से व्यापार खत्म हुआ तो लोगों ने खेती शुरू की। हालांकि, बाद में सेना की बढ़ती चौकसी और घाटियों में निगरानी से भी बदलाव आया। किसानों की करीब 60 फीसदी जमीन सेना ने अपने पास रखी। इसके बदले उन्हें मुआवजा दिया जान लगा। हालांकि, नीती और माणा घाटी में भोटिया जनजाति के करीब 20 हजार लोग निवास करते हैं। ग्रामीण अपनी बची जमीन पर राजमा और आलू की खेती करते हैं। ठंड अधिक होने के कारण यहां पर धान और गेहूं की फसल नहीं उपजती है। स्थानीय ग्रामीण ऊन के कपड़े बनाने का भी काम करते हैं। महिलाएं भी इस काम को करती हैं। इसे मेले और चारधाम यात्रा में बेचा जाता है। इसी समुदाय की बनी ड्रेस पीएम मोदी ने पिथौरागढ़ के पार्वती कुंड मंदिर दौरे के दौरान भी पहनी है।











