युगों का निर्माण क्रियाशीलता से होता है । निष्क्रिय जीव जीवन पर्यंत पश्चाताप , ईर्ष्या, द्वेष, षडयंत्र, नकारात्मकता की दवाग्नि में जलता रहता है। और सक्रिय व्यक्ति दहकते अंगारों पर भी जब पैर रखता है , तो वह ठंडे हो जाते हैं । मात्र ठंडे ही नहीं होते उनमें भी याचना के स्वर उभरते हैं। क्रियाशीलता मार्गदर्शन भी चाहती है एवम दृणसंकल्प भी । सार्थकता के लिए जीवन में आवश्यक है सकारात्मक वृहद दृष्टिकोण एवम अपने कर्तव्यपथ पर निरंतर चलते रहने का जुनून । जीवन की सार्थकता कीड़े मकोड़े की तरह जीने में नहीं है । सार्थकता है तो पहचान बनाने के लिए । हमारे जीवन में हम सभी को ऐसी पहचान बनाने की आवश्यकता है जो हमारी मूल संस्कृति वसुधेव कुटुंबकुम सभी के लिए जिए सब अपने हैं । हमारे आस पास जो भी जरूरतमंद हैं उन सभी के सहयोग करने का प्रयास करें ऐसी पहचान हमारी भारतीय संस्कृति को गौरवान्वित करेगी व भविष्य में संपूर्ण विश्व को एक नई दिशा देगी ऐसी पहचान बनाने के लिए अपन सबको जितना भी संघर्ष करना पड़े करना चाहिए । नहीं तो हम अपनी देह, धर्म, राष्ट्र, संस्कृति पर दीमक की तरह हैं । हम अपने कर्मक्षेत्र में जो भी कार्य करते हैं । उनका यश, अपयश केवल हमारा नहीं होता जब हम अपने कर्मक्षेत्र में व्यावहारिक जीवन में कुछ अच्छा कार्य करेंगे उस अच्छे कार्य से केवल हम गोरवान्वित नहीं होंगे हमारे अच्छे कार्य से हम अपने नगर, क्षेत्र, मित्रों, परिवार व अपने राष्ट्र को गौरवान्वित करेंगे व सभी के सम्मान में बढ़ोतरी होगी । ऐसा ही गलत कार्यों में है जब कोई गलत कार्य करता है तो वह केवल स्वम अपमान का पात्र नहीं होता उसके गलत कार्य से उसके नगर, क्षेत्र, मित्रों,परिवार को अपमानित होना पड़ता है व हमारी संस्कृति व हमारे राष्ट्र के सम्मान पर एक कलंक का धब्बा बनता है । हम सभी को यह स्मरण होना चाहिए हमारी पहचान केवल हमारी नहीं है हमारे साथ हमारे पूज्य माता पिता हमारा नगर, मित्रगण हमारे राष्ट्र की पहचान है । हम जो भी अपने जीवन में अच्छे बुरे कर्म करेगे उनसे हमारे अपनों की पहचान जुड़ी है उनका सम्मान जुड़ा है । हमारे पूज्य माता पिता के दिए संस्कार जुड़े हैं जब हम कोई अच्छा कार्य करेंगे तो हमारे माता , पिता को आत्मीय सुख की अनुभूति होगी हमारे नगर के सभी परिजन, मित्रगण सभी को आत्मीय प्रसन्नता होगी वह सभी गोरवान्वित होंगे तो हम सभी अपने कर्मक्षेत्र में निजी जीवन में यह स्मरण करें के हमारे अपनों को हम अपने कर्मों से प्रशन्न व गोरवान्वित होने के क्षण दें न की हमारे कर्मो से अपमानित व दुखी होने के क्योंकि हमारे ऊपर बड़ी जिम्मेदारी है । सफलता और सिद्धि के लिए संघर्ष केंद बिंदु है । उसके बिना सबकुछ व्यर्थ है । संघर्ष में दृण होकर सभी परिस्थितियों का सामना करना आवश्यक होता है । ज्यादातर अपनी आत्मसंस्कृति और स्वाध्याय से उसे समान धर्मा बनाने के लिए श्रम करना पड़ता है। इसी श्रम की सफलता पर हमारी सार्थकता के महल खड़े होते हैं । मात्र सीमित संकल्प पर्याप्त नहीं है । इसके लिए स्वार्थ से दूर रहना होगा और मनोबल को धूप तारे की तरह अनंत ऊंचाइयों में बनाए रखना होगा । सारे कार्य निष्ठापूर्वक और अपनी अधिकतम क्षमताओ का उपयोग करते हुए करने होंगे । उजला मन, जाग्रत मस्तिष्क चेतना के समीप है इसलिए उन्हें प्रज्वलित रखना होगा । परमार्थ करना होगा केवल अपने लिए नहीं सभी के लिए जीना होगा तब हमारी जिंदगी की सार्थकता सिद्ध होगी ।
यह आलेख मेरे द्वारा जिंदगी के व्यक्तिगत चिंतन पर लिखा है ।
राजा पाठक,लेखक











