आज की स्ट्रगल स्टोरी में कहानी वीरेंद्र सक्सेना की। वीरेंद्र को सरकार, सुपर 30 और दिल है कि मानता नहीं जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है। हालांकि उन्हें बड़ा ब्रेक महेश भट्ट की फिल्म आशिकी से मिला था। 80 फिल्मों का हिस्सा रहे वीरेंद्र सक्सेना का यहां तक का सफर संघर्षों से भरा रहा।
पिता के गुजर जाने के बाद तंगी से परेशान वीरेंद्र ने कम उम्र में ही छोटे-मोटे काम करने शुरू कर दिए थे। उन्होंने कभी बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर तो कभी राजा के यहां चिट्ठियां लिख कर घर का खर्च चलाया।
एक मामूली नाटक से शुरू हुआ एक्टिंग का सफर उन्हें NSD तक ले गया, फिर वहां से उन्होंने एक टीवी फिल्म तमस से फिल्मों में एंट्री ली।
72 साल के वीरेंद्र सक्सेना को प्रोफेशनल लाइफ में हर मोड़ पर खुद को साबित करना है।
पूरा बचपन गरीबी में बीता, अंडे और दूध बेचकर गुजारा करना पड़ा
वीरेंद्र कहते हैं, मेरी पैदाइश उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में हुई थी। हम 4 भाई-बहन थे और मैं उनमें सबसे छोटा था। पिता ड्रेनेज डिपार्टमेंट में छोटे पद पर कार्यरत थे। उनकी आमदनी कम थी और परिवार में लोग ज्यादा थे। सबकी जरूरतों को कम आमदनी में पूरा करना बहुत मुश्किल था। जब कभी-कभार पैसों की कमी होती, तो पड़ोसियों से उधार मांग कर खर्च निकाला जाता था। इसी तरह पूरा बचपन गरीबी में बीता।
वक्त के साथ सभी की जरूरतें बढ़ने लगी थीं। हमने 2 गाय खरीद ली थी और मुर्गी पालन किया था। कुछ दिनों तक दूध और अंडे बेचकर भी घर के खर्च के चलाए। हालांकि इस दुख भरे सफर में भी हम खुश रहते थे।
चारों भाई-बहन एक ही स्कूल में पढ़ते थे, ताकि किसी एक की फीस माफ हो सके। सभी की फीस लगभग 10-12 रुपए थी, मगर पिता इसे टाइम पर भर नहीं पाते थे तो हमारा नाम स्कूल से काट दिया जाता था।
फिर फीस जमा करने के बाद ही दोबारा स्कूल में दाखिला होता था। बार-बार नाम कटने पर बहुत शर्मिंदगी होती थी। दोस्त मजाक भी बनाते थे, पर पिता की आर्थिक स्थिति से हम सभी वाकिफ थे। उनसे बिना कोई सवाल किए हम ये अपमान सह लेते थे।
पिता के निधन के बाद मामा सहारा बने
जैसे-तैसे कम पैसों में ही पूरा परिवार गुजर-बसर कर रहा था कि तभी 1966 में पिता का निधन हो गया। वो लंबे समय से कैंसर से पीड़ित थे। उनके चले जाने से मानों घर पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पूरे घर में सिर्फ वही कमाने वाले थे। हम तीनों भाई उस वक्त पढ़ रहे थे और बहन की शादी हो गई थी।
इस वक्त हमारे 4 मामा मसीहा बने। वो लोग हर महीने 50-50 रुपए भेज देते थे, जिससे कुछ हद तक घर और फीस का खर्च निकल जाता था।
बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर गुजारा किया
कुछ समय बाद परिवार की बेहतरी के लिए मैं ग्रेजुएशन के साथ ट्यूशन पढ़ाने लगा, जिससे मुझे 12 रुपए महीने मिलते थे। फिर एक डॉक्टर के बच्चे को पढ़ाया, जहां पर 15 रुपए मिल जाते थे।
डर था दोस्तों के हाथों ना मारा जाऊं
पिता के निधन के बाद सबसे बड़ा बदलाव मेरे व्यवहार में आया। मेरी दोस्ती कुछ गुंडों से हो गई थी। दोस्ती होने का सबसे बड़ा कारण यह था कि मैं गाता-बजाता था, जिससे आस-पास के लोग मुझे जानने लगे थे। इसी तरह सबसे दोस्ती हो गई थी।
वो लोग मामूली गुंडे नहीं थे, बल्कि लोगों की हत्या कर देते थे। कई बार मुझे पता रहता था कि कौन किसकी हत्या करने वाला है। मैं चाह कर भी विक्टिम की मदद नहीं कर पाता था।
हर मुमकिन कोशिश करता था, लेकिन मेरे जानने वाले ही मुझे धमकी देने लगते। कुछ समय बाद यह समझ में आ गया कि ऐसी दोस्ती भारी पड़ सकती है। क्या पता कब मैं खुद विक्टिम बन जाऊं। इस कारण मन में मथुरा से बाहर जाने के ख्याल आने लगे।
18 की उम्र में घर छोड़ा
उन लोगों की दोस्ती का असर पढ़ाई पर भी पड़ने लगा था, जिससे बड़ा भाई बहुत नाराज था। आखिरकार उसने एक दिन चिठ्ठी के जरिए सारी नाराजगी जाहिर कर दी। उसकी बातों से बहुत दुख पहुंचा और 18 साल की उम्र में मैंने घर छोड़ दिया। इस बात की नाराजगी इतनी ज्यादा थी कि मैं 18 साल बड़े भाई के घर नहीं गया।
5 दिन भूखा रहा, हालात खराब होने पर एडमिट होना पड़ा
घर छोड़ने के बाद मैं एक दोस्त के पास चला गया। यहां आए 5 दिन बीत गए, लेकिन मुझे अन्न का एक दाना और पानी तक भी नसीब नहीं हुआ। दोस्त को लगता था कि मैं बाहर जाकर कुछ खा लेता होऊंगा, पर मेरे पास तो एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी।
फिर एक दिन 25 पैसे गिरे हुए मिले, जिससे मैंने 5 केले खरीदे और खाए। तब तक हालत इतनी खराब हो गई थी कि मुझे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
100 रुपए में चिट्ठी लिखने की नौकरी की
यह बात 1976 की है। एक दोस्त की मदद से राजा महेंद्र प्रताप का सेक्रेटरी बन गया और उन्हीं के साथ दिल्ली आना-जाना लगा रहता था। यहां पर हर दिन 3 चिट्ठी लिखनी रहती थी। इस काम के लिए हर महीने 100 रुपए मिलते थे।
कुछ समय बाद कॉलेज के सीनियर अनिल चौधरी से मुलाकात हुई। वो उन दिनों एक नाटक का डायरेक्शन कर रहे थे। उन्होंने एक छोटा सा रोल मुझे भी ऑफर किया। पहले तो मैं बहुत डरा हुआ था, लेकिन बाद में हिम्मत करके वो रोल कर दिया। अगले दिन पेपर में नाम भी छप गया, जिसे देखकर बहुत खुशी मिली।
हालात खराब हुए तो पोस्टर बनाकर गुजारा करने की नौबत आई
इधर राजा साहब लंबे समय के लिए मसूरी जा रहे थे। उनके साथ जाने में असमर्थ था, इसलिए उनकी नौकरी छोड़नी पड़ी। फिर छोटे भाई के एक दोस्त के घर रहने लगा। इस बार भी भगवान ने बेघर होने से मुझे बचा लिया, मगर पैसों की दिक्कत अभी भी थी।
कुछ दिन ऐसे ही तंगी में बीते। फिर NSD के बच्चों के लिए पोस्टर बनाने का काम मिल गया। प्रति पोस्टर 2 रुपए मिल जाते थे। फिर ये सिलसिला 3 साल तक चला और इसी के सहारे पेट पालता रहा।
NSD में एक्टिंग की पढ़ाई की
पोस्टर बनाने के काम से मेरा झुकाव थिएटर की तरफ बढ़ता गया। नाटक भी करने लगा। फिर 1979 में एग्जाम क्लियर कर NSD में एडमिशन हो गया। 3 साल यहां पढ़ाई करने के बाद मैं 1982 में पास आउट हो गया। इस दौरान मैंने बहुत सारे प्ले किए, जिससे लोग मुझे जानने लगे थे।
यहां से पास आउट होने के बाद मैंने कुछ साथियों के साथ 1984 में ग्रुप संभव बनाया और जगह-जगह जाकर प्ले करने लगा।
गोविंद निहलानी ने दिया बड़ा ब्रेक
एक दिन मेरे पास गोविंद निहलानी का काॅल आया और उन्होंने मिलने को कहा। इतने बड़े डायरेक्टर की पेशकश भला कौन ठुकरा सकता था। बिना वक्त गंवाए उनसे मिलने होटल पहुंच गया, जहां वो ठहरे हुए थे। उन्होंने मुझे 1988 की टीवी फिल्म तमस में एक रोल ऑफर किया। उन्होंने बताया कि उस किरदार में वो नसीर साहब को कास्ट करना चाहते थे, लेकिन नसीर के बिजी शेड्यूल के कारण बात नहीं बन पा रही है।
इस वजह से निहलानी साहब चाहते थे कि मैं वो रोल करूं, लेकिन अगर बाद में नसीर साहब ने हां कर दिया, तो मेरे से यह ऑफर ले लिया जाता। मैंने उनकी शर्त मान ली। फिर उन्होंने कुछ लाइनें पढ़ कर सुनाने को कहीं। फिर 3 दिन बाद उनकी तरफ से मेरा नाम कन्फर्म हो गया।
20 हजार रुपए लेकर मुंबई आए थे, महेश भट्ट की फिल्म आशिकी से बदली किस्मत
वक्त के साथ मुझे एहसास होने लगा कि थिएटर से मिलने वाले पैसों से आरामदायक जिंदगी नहीं बिताई जा सकती। इसी को देखते हुए मैंने मुंबई आने का फैसला किया। जब 1989 में मुंबई आया, तो मेरे पास सिर्फ 20 हजार रुपए थे।
मैं दिल्ली में नामी थिएटर आर्टिस्ट था, लेकिन मुंबई आने पर शून्य से शुरुआत करनी पड़ी। एक साल तक थिएटर करके ही गुजारा करना पड़ा। इस दौरान महेश भट्ट से मेरी बढ़िया जान-पहचान हो गई। वो मेरे टैलेंट से बहुत इम्प्रेस हुए और फिल्म आशिकी में काम दे दिया।
बड़बोलेपन की वजह से बड़े प्रोजेक्ट्स से हाथ धोना पड़ा
मैं कई बड़े प्रोजेक्ट से निकाला भी गया हूं और छोड़ भी दिया है। निकाला इसलिए गया हूं क्योंकि मैं बिना सोचे-समझे हर बात लोगों के मुंह पर बोल देता हूं। जो बात पसंद नहीं आती, वो दिल में नहीं रख पाता हूं और कह देता हूं। इसी कारण कई बड़े प्रोजेक्ट्स से हाथ धोना पड़ा।
दूसरी तरफ कई प्रोजेक्ट्स को ठुकराया भी क्योंकि उनकी कहानियां मुझे फीकी लगीं। शुरुआत से ही खुद की शर्तों पर जिंदगी जी है, इसलिए किसी राइटर के हिसाब से रील लाइफ में भी एक्ट नहीं करना चाहता था। उन्हीं रोल को करता हूं, जो मेरे मन मुताबिक होता है।
इसके बाद मैंने फिल्म दामिनी, जिद्दी, परदेसी बाबू और सरकार जैसी फिल्मों में काम किया। हाल में मैंने भीड़ और मिशन रानीगंज में काम किया है। आने वाले दिनों में अभी तक किसी बड़ी फिल्म का हिस्सा नहीं बना हूं। एक-दो सीरीज हैं, जिनमें नजर आऊंगा।











