भोपाल। प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं में अपेक्षाकृत उन्नयन के बाद भी कई जगह इसकी तस्वीर धुंधली है। स्वास्थ्य लोगों की जिंदगी से जुड़ा विषय होने के बाद भी राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में उस तरह नहीं रहता जैसी आवश्यकता है। इसकी वजह यह है कि यह मुद्दा मतदाता को सीधे तौर पर नहीं रिझाता लेकिन सच्चाई यह है कि लोग स्वस्थ रहेंगे तभी अन्य क्षेत्रों में भी स्थितियां बेहतर हो सकती हैं। यह तभी संभव है जब लोगों को "स्वास्थ्य का अधिकार" दिया जाए। हर स्तर के अस्पताल के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के मानक तय हों और उन्हें पूरा करने की गारंटी हो।
प्रदेश में जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में स्वास्थ्य सुविधा से जुड़े संसाधन नहीं बढ़े हैं। सबसे ज्यादा परेशानी डाक्टर्स की कमी के कारण हो रही है। प्रदेश की लगभग साढ़े आठ करोड़ जनसंख्या के उपचार के लिए सरकारी अस्पतालों में (स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा और गैस राहत के अस्पताल मिलाकर) 9 हजार 635 डाक्टर ही हैं। इस हिसाब से 8 हजार 882 लोगों पर केवल एक सरकारी डाक्टर है।
डब्ल्यूएचओ का मापदंड नहीं होता पूरा
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का मानक एक हजार लोगों पर एक एलोपैथी डाक्टर का है। प्रदेश के लगभग 16 हजार निजी डाक्टरों को भी मिला दें तो भी यह मापदंड पूरा नहीं होता। डाक्टरों की कमी दूर करने के लिए सेवा शर्तें बेहतर करनी होंगी। साथ ही अन्य विषय भी हर राजनीतिक दल के एजेंडे में प्राथमिकता से शामिल होने चाहिए।
ग्रामीण क्षेत्र के अस्पताल बड़ी चुनौती
राज्य सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती ग्रामीण क्षेत्र के अस्पतालों की सेहत सुधारना है। हाल कितने खराब हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि लगभग 375 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) बंधपत्र के अंतर्गत एक वर्ष के लिए नियुक्त डाक्टरों के भरोसे चल रहे हैं। 114 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में तो कोई डाक्टर ही नहीं है। हाल यह है कि मेडिकल कालेज के अस्पताल को मिलाकर भी सिर्फ 139 अस्पतालों में सर्जरी से प्रसव की सुविधा है। इसकी बड़ी वजह भी डाक्टरों की कमी ही है।
वेंटिलेटर चलाने के लिए एनेस्थीसिया विशेषज्ञ की कमी
प्रदेश की शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर का अनुपात अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा होने का बड़ा कारण तुरंत सीजर नहीं हो पाना है। जिला अस्पतालों में कोरोना काल में आइसीयू तो बना दिए गए पर वेंटिलेटर चलाने के लिए एनेस्थीसिया विशेषज्ञ 385 की जगह 162 ही हैं।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड (आइपीएचएस) लगभग आठ वर्ष पहले बनाया था। इसमें हर श्रेणी के अस्पतालों के लिए संसाधन निर्धारित किए गए हैं, पर प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग ने आज तक इसे अपनाया ही नहीं। जनसंख्या के अनुपात में किस श्रेणी के कितने अस्पताल होने चाहिए इसके मापदंड प्रदेश सरकार ने खुद तय किए हैं। इसके अनुसार भी हर श्रेणी के लगभग आधे अस्पताल ही हैं। 30 हजार की आबादी पर एक पीएचसी होना चाहिए, इस हिसाब से साढ़े आठ करोड़ लोगों के लिए 2833 पीएचसी होने चाहिए, पर 1445 ही हैं। 1.2 लाख जनसंख्या पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) होना चाहिए। इस हिसाब से 708 की जगह 353 ही हैं। उप स्वास्थ्य केंद्र भी 17 हजार की जगह 10, 111 ही हैं।
संसाधनों की इतनी कमी
कैंसर मरीजों की सिंकाई के लिए मेडिकल कालेज से संबद्ध अस्पतालों में लीनियर एक्सीलेरेटर की सुविधा नहीं है।
52 जिला अस्पतालों में गंभीर प्रसूताओं के उपचार के लिए आईसीयू नहीं है।
किसी भी जिला अस्पताल में एमआरआइ जांच की सुविधा नहीं है।
दुर्घटना के बाद पहला घंटा घायलों को बचाने के लिए गोल्डन आवर कहा जाता है, पर जिला अस्पतालों में ट्रामा यूनिट के नाम पर सिर्फ एक कमरा है।
हृदय की बीमारियों की जांच के लिए जिला अस्पतालों में टीएमटी और ईको की सुविधा नहीं है।
प्रदेश के 10 जिला अस्पताल सिर्फ 200 और चार 100 बिस्तर के ही हैं। एक्स-रे और सोनोग्राफी वर्षों पुरानी मशीनों से की जा रही है, जबकि डिजिटल उपकरण आ गए हैं।
सुपर स्पेशियलिटी उपचार की पर्याप्त सुविधाएं मेडिकल कालेजों में भी नहीं होने से मरीजों को किडनी और लिवर ट्रांसप्लांट, बोन मैरो ट्रांसप्लांट और हार्ट सर्जरी के लिए प्रदेश से बाहर जाना पड़ता है।











