लंदन में युवा पीढ़ी बड़े चाव से हिंदी सीख रही है

लंदन में युवा पीढ़ी बड़े चाव से हिंदी सीख रही है

 भोपाल। जहां भारत की युवा पीढ़ी हिंदी व अन्य अपनी प्रादेशिक भाषाओं से दूर होकर आधुनिकता के नाम पर अंग्रेजी और अंग्रेजीयत को अपनाकर हिंदी और देशज भाषाओं से दूर होती जा रही है, वहीं लंदन जैसे अत्याधुनिक कहे जाने वाले यूरोपीय शहर में पुरानी ही नहीं युवा पीढ़ी भी हिंदी सीख रही है। लंदन में हिंदी की कई जगह नियमित कक्षाएं लगती हैं और हिंदी सेवी स्वेच्छा से अवैतनिक हिंदी पठन-पाठन का कार्य कई समुदाय में करते हैं। यह कहना है वरिष्ठ साहित्यकार और अप्रवासी साहित्य शोध के अध्येता डा जवाहर कर्नावट का जो विगत दिनों भारोपीय हिंदी महोत्सव केंद्र, लंदन द्वारा आयोजित वातायन अंतरराष्ट्रीय समारोह में भाग लेकर भोपाल लौटे हैं। वे मंगलवार को लंदन यात्रा के संस्मरण उनका अभिनंदन करने वाले साहित्यिक मित्रों से मीनाल रेजीडेंसी में साझा कर रहे थे। उनका अभिनंदन करने वालों में वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश पटवा, घनश्याम मैथिल “अमृत”, डा विवेक रंजन श्रीवास्तव और राजकुमार बरुआ आदि प्रमुख थे।

हिंदू धर्म और संस्कृति के प्रति सम्मान का भाव है

इस अवसर पर उन्होंने बताया की यह सुखद आश्चर्य है कि लंदन में भारतीय बच्चे न सिर्फ हिंदी, बल्कि हमारी अन्य प्रादेशिक भाषाएं जैसे गुजराती, पंजाबी, मराठी आदि भी सीखकर अपने संस्कार और संस्कृति से जुड़े रहना चाहते हैं। यह भारतीय संस्कृति का यूरोपीय देशों में विस्तार दर्शाता है। वहां के लोगों में हिंदू संस्कृति के प्रति सम्मान का भाव है, इसलिए वे हिंदी सीखना चाहते हैं। ज्ञातव्य है कि कर्नावट ने प्रवासी भारतीय हिंदी पत्रकारिता पर एक पुस्तक लिखी है।

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