भारत को दुनिया की सबसे घातक जैवलिन मिसाइल देगा अमेरिका

भारत को दुनिया की सबसे घातक जैवलिन मिसाइल देगा अमेरिका

भारतीय सेना अमेरिका से जैवलिन एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम खरीद रही है। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने शुक्रवार को बताया कि, इसे खरीदने के लिए भारतीय सेना की ओर से लेटर ऑफ ऑफर एंड एक्सेप्टेंस (LOA) पर साइन कर दिए गए हैं।

जैवलिन एक एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम है। इसे सैनिक कंधे से लॉन्च कर सकते हैं और यह बख्तरबंद वाहनों जैसे लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए बनाया गया है। एक बार दागने के बाद मिसाइल खुद ही थर्मल टेंपरेचर से टारगेट को ढूंढ लेती है और उसे हिट करती है।

इमरजेंसी खरीद प्रक्रिया के तहत हुए इस सौदे में 60 जेवलिन मिसाइल सिस्टम खरीदे जाएंगे। इनकी कुल कीमत 292 करोड़ रुपए हो सकती है। इसकी डिलीवरी दिसंबर से शुरू हो सकती है। इसके अलावा, दोनों देश इस मिसाइल सिस्टम को भारत में ही बनाने पर भी काम कर रहे हैं।

जेवलिन को अमेरिकी रक्षा कंपनियों लॉकहीड मार्टिन और आरटीएक्स (रेथियॉन) ने बनाया है। इससे भारतीय सेना सीमा पर खासकर कठिन पहाड़ी और मैदानी इलाकों में दुश्मन के बख्तरबंद टैंकों और बंकरों को नेस्तनाबूद कर सकेगी।

जैवलिन मिसाइल सिस्टम क्या है, कितनी रेंज है?

Javelin (FGM-148) अमेरिका में बना एक मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम है। 4 किमी रेंज है। 22.3 किग्रा वजन है और दागो-और-भूल-जाओ तकनीक है। टॉप-अटैक मोड, जो टैंक के सबसे कमजोर हिस्से को खुद डिटेक्ट करके हमला करती है।

जैवलिन को किसने बनाया है?

जेवलिन को लॉकहीड मार्टिन और रिदियॉन के जेवलिन जॉइंट वेंचर ने डेवलप किया है। दोनों कंपनियां मिलकर इसका उत्पादन करती हैं।

यह कैसे काम करता है?

जेवलिन की सबसे खास तकनीक “फायर एंड फॉरगेट” है। यानी लॉन्च से पहले सिस्टम लक्ष्य को पहचानकर उस पर लॉक करता है और मिसाइल दागे जाने के बाद उसे ऑपरेटर को लगातार नियंत्रित करने की जरूरत नहीं होती। मिसाइल खुद लक्ष्य तक पहुंचती है।

इसमें इन्फ्रारेड सीकर लगा होता है, जिससे यह दिन-रात और अलग-अलग मौसम में लक्ष्य को ट्रैक कर सकती है। जेवलिन टॉप-अटैक मोड में लक्ष्य के ऊपर से हमला कर सकती है, जहां टैंक का कवच आमतौर पर अपेक्षाकृत कमजोर होता है। जरूरत के मुताबिक यह डायरेक्ट-अटैक भी कर सकती है।

यह मिसाइल भारत के लिए क्यों अहम है?

भारत के लिए जैवलिन की अहमियत मुख्य रूप से एंटी-आर्मर क्षमता बढ़ाने में है। खासकर पहाड़ी और सीमावर्ती इलाकों में छोटे दलों के लिए पोर्टेबल एंटी-टैंक सिस्टम उपयोगी हो सकता है।

भारत जेवलिन मिसाइल कब से लेने की कोशिश कर रहा था

भारत 2010 से (यूपीए सरकार) जेवलिन लेने की कोशिश में था, तब सेना के पास 44,000 एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल की कमी थी। 2012 में अमेरिका ने टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से मना कर दिया तो डील रुक गई। उस वक्त हम फ्रांस की मिलान और रूस की कॉनकर्स एटीजीएम चला रहे थे।

फिर भारत ने इजराइल से स्पाइक मिसाइलें लीं। डीआरडीओ ने स्वदेशी एमपीटीजीएम मिसाइल बनाई। 2015-2024 टेस्ट पूरे, जल्द सेना में शामिल होंगी।

अब अमेरिका क्यों राजी हुआ

उसकी मजबूरी है। इंडो-पैसिफिक में चीन को घेरने, भारत की रूस पर निर्भरता घटाने और भारत की ‘मेक इन इंडिया’ नीति के कारण तकनीक देने को तैयार हुआ।


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