पौराणिक कथा और इतिहास शक्तिपीठ:
यह देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर जा रहे थे, तब विष्णु भगवान के सुदर्शन चक्र से सती के अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे थे।इतिहास: इस मंदिर का पहला उल्लेख 15वीं शताब्दी में मिलता है। 1880 में आए विनाशकारी भूस्खलन में यह मंदिर नष्ट हो गया था, जिसके बाद 1883 में इसे दोबारा बनवाया गया।
मंदिर की मुख्य बातें :
आँखों की पूजा: गर्भगृह में माँ सती की दो आँखों की पूजा की जाती है।अन्य मूर्तियाँ: नैना देवी के साथ-साथ इस मंदिर में भगवान गणेश और माँ काली की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं।स्थानीय नाम: स्थानीय लोग माँ नैना देवी को प्यार से 'नंदा माता' भी कहते हैं।
यात्रा और समय (Timing)दर्शन का समय:
मंदिर आमतौर पर सुबह 06:00 बजे से रात 09:00 बजे तक खुला रहता है।
उत्सव:
चैत्र और शारदीय नवरात्र के समय यहाँ विशेष उत्सव और मेलों का आयोजन किया जाता है, जहाँ भारी संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते हैं।
कैसे पहुँचें:
यह मंदिर नैनीताल के मल्लीताल इलाके में स्थित है और मुख्य बस स्टैंड से पैदल या रिक्शे द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।











