मानव संग्रहालय में इस माह प्रमुख आकर्षण है बाघ की एक खास मूर्ति, जानिए किस लोक समुदाय से है नाता

मानव संग्रहालय में इस माह प्रमुख आकर्षण है बाघ की एक खास मूर्ति, जानिए किस लोक समुदाय से है नाता
भोपाल। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के अंतरंग भवन वीथि संकुल में मंगलवार को माह अगस्त के प्रादर्श के रूप में ग्राम उप्पुण्दा, जिला- उडुपी, कर्नाटक के लोक समुदाय से संकलित लकड़ी पर बनी बाघ की मूर्ति 'चिराटे' को दर्शकों के अवलोकन हेतु प्रदर्शित किया गया है। इस प्रादर्श का उद्घाटन संग्रहालय के निदेशक डा भुवन विक्रम द्वारा किया गया। इस प्रादर्श का संयोजन संस्‍थान के सहायक क्यूरेटर डा सूर्यकुमार पांडेय द्वारा किया गया है।

इसके बारे में जानकारी देते हुए डा सूर्यकुमार पांडेय ने बताया कि चिराटे दक्षिणी कर्नाटक और उत्तरी केरल के एक क्षेत्र तुलुनाडु में प्रचलित भूता पंथ से संबंधित लकड़ी पर बनी बाघ की मूर्ति है। ऐसा माना जाता है कि चिराटे मातृ देवी का अवतार है और त्योहारों के अवसर पर भूता-आराधना के दौरान उनकी पूजा की जाती है। लकड़ी की यह मूर्ति वरिष्ठ बढ़ई कलाकार रत्नाकर गुडीगारा द्वारा बनाई गई है। स्थानीय क्षेत्र में प्रचलित एक मिथक के अनुसार एक समय कुछ बुरे व्यक्ति गांव वालों को परेशान कर रहे थे। चिराटे ने ग्रामीणों की रक्षा की और सभी बुरे व्यक्तियों को मार डाला और इस तरह चिराटे की लोकप्रियता में वृद्धि हुई और लोगों ने उनकी पूजा करना प्रारंभ कर दिया।

भूता काष्ठ मूर्तियों का संकलन मौजूद

भूता पंथ की उत्पत्ति टोटम और पूर्वज पूजा की अवधारणाओं से मानी जा सकती है। इसमें मातृदेवी, नाग और वृक्ष पंथ भी सम्मिलित हैं। विषेष शैली में निर्मित इन काष्ठ मूर्तियों के निर्माता गुडीगारा समुदाय है, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्हें पुर्तगालियों के उत्पीड़न के कारण गोवा से निर्वासित होना पड़ा और वे तटीय कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों में बस गए। ये काष्ठ उत्कीर्णन में तथा उत्कीर्णित मूर्तियों के लिए पोशाक और आभूषण बनाने में अत्यंत कुशल कारीगर हैं। गुडीगारा ने स्थानीय बढ़ईयों की मदद से इन शैलीबद्ध आकृतियों का सृजन किया है। मानव संग्रहालय ने बहुत-सी भूता काष्ठ मूर्तियों का संकलन किया है, जिन्हें संग्रहालय की मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में देखा जा सकता है।

Advertisement