साइकिल से गिरकर चलने-फिरने से लाचार हो गया था बालक, बीएमएचआरसी के डाक्टरों ने की स्पाइनल कार्ड की जटिल सर्जरी

साइकिल से गिरकर चलने-फिरने से लाचार हो गया था बालक, बीएमएचआरसी के डाक्टरों ने की स्पाइनल कार्ड की जटिल सर्जरी
भोपाल । सिलवानी, रायसेन में रहने वाले 11 वर्ष के बालक की साइकिल चलाने के दौरान गिरने से गर्दन और सिर के बीच की हड्डी अपनी जगह से हट गई। और इसने स्पाइनल कार्ड को दबा दिया था। इस कारण से बच्चा लगभग अपंग सा हो गया था। उसके हाथ-पैर ने काम बंद कर दिया था। वह अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। इस बच्चे का बीएमएचआरसी (भोपाल मेमोरियल हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर) के न्यूरो सर्जरी विभाग में दो चरण में सफल आपरेशन किया गया है। बच्चा अब पहले से बेहतर है और अपने पैरों पर चलने भी लगा है। डाक्टरों का कहना है कि अगले छह माह में वह पूरी तरह ठीक हो जाएगा। बीएमएचआरसी के अतिरिक्त यह सर्जरी एम्स में ही हो रही है।


पहले चरण में ऐसे की सर्जरी

 न्यूरो सर्जरी विभाग के प्रमुख डा. संदीप सोरते ने बताया कि बच्चे के माता-पिता बीएमएचआरसी उसे लेकर आए थे। सीटी स्कैन और एमआरआइ जांच के बाद बच्चे का दो चरणों में आपरेशन करने का फैसला किया। पहले चरण में स्पाइनल कार्ड पर दबाव बना रही एक हड्डी को मुंह के रास्ते से सर्जरी कर काटा गया। इस पूरे आपरेशन में करीब चार घंटे का समय लगा।

 

दूसरे चरण की सर्जरी में लगे 07-08 घंटे

 न्यूरो सर्जरी विभाग में सहायक प्रोफेसर डा. सौरभ दीक्षित ने बताया कि कुछ दिन बाद दूसरे चरण में गर्दन के पीछे की हड्डी को काटकर बाकी हड्डी को स्क्रू और राड से जोड़ा गया। इस तरह नस स्पाइनल कार्ड पर पड़ रहे दबाव को हटाया गया। इस चरण में कुल 7-8 घंटे का समय लगा। आपरेशन के बाद मरीज की फिजियोथैरेपी शुरू की गई। फिजियोथैरेपिस्ट डा. नेहल शाह ने बताया कि आपरेशन से पहले मरीज की मांसपेशियों में कोई ताकत नहीं थी, जिसके लिए उसे हाथ-पैरों के कुछ व्यायाम करवाए गए। सांस के लिए भी कसरत बताई गई। आपरेशन के बाद मांसपेशियों ने काम करना शुरू किया।

  

इसलिए दो चरणों में करना पड़ा आपरेशन

 

डा. सौरभ दीक्षित ने बताया कि मरीज का एक बार में आपरेशन करना मुमकिन नहीं था, क्योंकि स्पाइन कार्ड पर दबाव बनाने वाली हड्डी को एक बार आगे से काटना था और दूसरी बार पीछे से। बच्चे की उम्र कम थी, इसलिए उसे कितने समय तक बेहोश करके रखना है, इसका ध्यान रखना भी जरूरी था।

 क्यों मुश्किल था आपरेशन

 

निश्चेतना विभाग में प्रोफेसर डा. सारिका कटियार ने बताया कि आपरेशन के लिए मरीज को जनरल एनेस्थीशिया देना होता है। मरीज को बेहोश करने व कृत्रिम सांस देने के लिए एक ट्यूब को मुंह से फेफड़ों तक पहुंचाया जाता है। चूंकि मरीज की स्पाइनल कार्ड गर्दन की हड्डी से दबी हुई थी, इसलिए ट्यूब को अंदर तक पहुंचाना जोखिमपूर्ण था। सर्जरी के बाद इस ट्यूब को बाहर निकालना भी उतना ही मुश्किल होता है। अगर थोड़ी भी गड़बड़ होती है तो मरीज लकवे का शिकार हो सकता है। आपरेशन के दौरान ऐसे मरीजों की हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर बढ़ता-घटता रहता है, इसे मेंटेन करना बहुत मुश्किल होता है। सिर और गर्दन का जोड़ काफी नाजुक होता है। इसके आसापास खून की बड़ी और प्रमुख धमनियां होती हैं। आपरेशन के दौरान अधिक ब्लीडिंग होने का खतरा भी होता है। आपरेशन के बाद मरीज के लंबे समय तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर चले जाने की आशंका होती है।

 

प्राइवेट अस्पतालों में चार से 4.5 लाख खर्च

प्राइवेट अस्पतालों में इस सर्जरी पर चार से 4.5 लाख रुपये का खर्च आता है, लेकिन बीएमएचआरसी में प्रधानमंत्री जनारोग्य योजना से मरीज की निशुल्क सर्जरी की गई।


इनका कहना है


न्यूरो सर्जरी विभाग के डाक्टरों ने एक बेहद मुश्किल कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। मरीज की उम्र और उसकी स्थिति के मद्देनजर यह काफी जटिल सर्जरी थी। बीएमएचआरसी में बच्चों की रीढ़ की हड्डी के आपरेशन की शुरुआत की है। अभी के केस में बच्चे की हालत में सुधार हो रहा है और वह जल्द ही सामान्य हो जाएगा।

                                                               डा. मनीषा श्रीवास्तव, प्रभारी निदेशक, बीएमएचआरसी, भोपाल

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