जस्टिस ट्रूडो के कारण भारत-कनाडा के बीच तल्खी, अब आगे क्या होगी नई दिल्ली की रणनीति?
नई दिल्ली: कनाडा और भारत के दर्मियान हुए हालिया घटनाक्रम के बाद दोनों देशों के बीच पनपी राजनयिक तल्खी जल्दी खत्म होती नहीं दिखती। भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान से ये साफ किया है कि वो इस मसले पर आगे और कदम उठाने के लिए स्वतंत्र है तो दूसरी ओर कनाडा की ओर से भी इसी तरह के संकेत मिले हैं कि फिलहाल रिश्ते किसी भी दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। आइये जानने की कोशिश करते हैं कि डिप्लोमैटिक रिश्तों के दायरे के भीतर दोनों देशों के पास क्या संभावनाएं हैं । पिछले एक साल से ट्रूडो जिस तरह भारत सरकार पर आरोप लगा रहे हैं, उससे इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि कनाडा इस मामले को और आगे लेकर नहीं जाएगा।
कनाडा की ओर से मंगलवार को विएना कन्वेशन का जिक्र किया गया है, तो सवाल है कि क्या ऐसे में मामले को वो अंतराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश कर सकता है? इसे लेकर राजीव डोगरा कहते हैं कि कनाडा ने खुद ही विएना कन्वेशन के सारे नियम तक पर रख दिए हैं। क्योंकि कन्वेंशन के मुताबिक राजनयिकों को इम्युनिटी मिली होती है और उन्हें लीगल प्रक्रिया में घसीटा नहीं जा सकता। ऐसे में किस आधार पर इस मामले को उठा सकते हैं। वहीं प्रोफेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं कि जिस तरह का गैर जिम्मेदार अप्रोच कनाडा ने अब तक दिखाई है, उससे लगता नहीं कनाडा खुद ऐसे मामलों को उस स्तर पर उठाने का सोचेगा भी।
कनाडा सरकार की ओर से कहा गया है कि इस मामले को लेकर वो फाइव आईज और जी- 7 तक लेकर जाएगा। इस दिशा में पीएम ट्रूडो ने सोमवार को ब्रिटेन के पीएम के साथ चर्चा भी की है। हालांकि जानकार मानते हैं कि पिछले साल भी ट्रूडो ने इसी रणनीति पर काम किया था लेकिन इसका कोई फायदा हुआ नहीं। स्वर्ण सिंह कहते हैं कि जी सेवन समिट अगले साल कनाडा में होना है और अगर भारत विशेष आमंत्रित सदस्य की तरह अगर वहां जाने का फैसला ले तो क्या कनाडा की छवि के लिए लिए सही होगा ? जानकार मानते हैं कि बतौर ग्रुप ब्रिक्स की प्रतिष्ठा लगातार बढ़ रही है और ऐसे में चुनौतियों से घिरा जी - 7 भारत जैसी आर्थिक शक्ति को नाराज नहीं करना चाहेगा।
जानकार कहते हैं कि कनाडा की ओर से अब तक बेतुकी बयानबाज़ी , खासतौर से खुद वहां के पीएम की ओर से बिना तर्क के आरोप सामने आए हैं। लेकिन भारत में सरकार के शीर्ष स्तर पर खामोश रहकर एक्शन ओरिंइटेड अप्रोच के साथ काम किया गया है। भारत ने पिछले साल 41 कनाडाई राजनयिकों को देश छोड़ने के लिए कहा था और अब 6 को निष्कासित किया है। ऐसे में भारत की अप्रोच एक्शन ओरिटेंडेट रही है। भारत ने कनाडा की आक्रामक भाषा का शालीनता के साथ कड़ा जवाब दिया है। ऐसे में लगता नहीं कि अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी कनाडा के पीछे सपोर्ट में आएगी। पिछली बार भी अमेरिका ने कुछ हद तक इस मामले में कनाडा के साथ इंगेज किया था, बाकी देशों ने इस तरह वोट बैंक वाली राजनीति पर कुछ बोलने से दूरी बनाई थी











