कर्नाटक सरकार के कदम को बताया एकतरफा
मुख्यमंत्री विजय ने स्पष्ट कहा कि कर्नाटक सरकार का यह कदम एकतरफा है और यह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के 2007 के अंतिम फैसले तथा सुप्रीम कोर्ट के 2018 के आदेश की भावना के खिलाफ है। प्रस्ताव में कहा गया कि कर्नाटक ने न तो अन्य संबंधित राज्यों की सहमति ली है और न ही केंद्र सरकार से जरूरी मंजूरी प्राप्त की है, इसलिए यह परियोजना स्वीकार्य नहीं हो सकती। प्रस्ताव में केंद्र सरकार से मांग की गई है कि मेकेदातु परियोजना को किसी भी प्रकार की तकनीकी या पर्यावरणीय मंजूरी न दी जाए। साथ ही केंद्रीय जल आयोग (CWC) से भी आग्रह किया गया है कि वह कर्नाटक सरकार द्वारा जमा की गई विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) की समीक्षा या मंजूरी की प्रक्रिया आगे न बढ़ाए।प्रस्ताव में दोहराई यह बात
सरकार ने प्रस्ताव में यह भी दोहराया कि कावेरी बेसिन पहले से ही जल संकटग्रस्त क्षेत्र है और सुप्रीम कोर्ट ने उपलब्ध जल का बंटवारा पहले ही तय कर दिया है। ऐसे में इस बेसिन में नई परियोजनाएं शुरू करना या अतिरिक्त पानी का उपयोग करना नियमों के खिलाफ होगा। मुख्यमंत्री विजय ने कहा कि कावेरी मुद्दा तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच बेहद संवेदनशील है और इस पर किसी भी प्रकार का फैसला सभी राज्यों की सहमति से ही होना चाहिए। प्रस्ताव के अंत में तमिलनाडु सरकार द्वारा किसानों के हितों की रक्षा के लिए उठाए गए सभी कदमों को सदन ने समर्थन दिया। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर दक्षिण भारत की राजनीति में कावेरी जल विवाद को केंद्र में ला दिया है।











