शुक्रवार के घटनाक्रम में तिरंगे के साथ प्रतीकात्मक विरोध भी प्रमुखता से सामने आया। ऐसे में आंदोलनकारी संगठनों के सामने चुनौती है कि वे विरोध को जारी रखते हुए उसे व्यापक जनसमर्थन और विपक्षी एकजुटता से कैसे जोड़ते हैं।
दीपके की अपील के बावजूद हिरासत
CJP की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, पार्टी ने लोगों से किसी बड़े जमावड़े से बचने, छोटे समूहों में तिरंगे के साथ तस्वीर लेने और उसके बाद शांतिपूर्वक लौट जाने की अपील की थी। पार्टी का कहना है कि दीपके अकेले कनॉट प्लेस की ओर जा रहे थे, तभी पुलिस ने उन्हें रोककर हिरासत में ले लिया। सीजेपी ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जब वह अकेले चल रहे हैं तो उन्हें क्यों रोका जा रहा है। उन्होंने तिरंगा लेकर चलने को अपराध मानने पर भी आपत्ति जताई। CJP ने इसे शांतिपूर्ण विरोध को रोकने की कोशिश बताया है।नेहा बोरा की हिरासत से छात्र आंदोलन पर नजर
AISA अध्यक्ष नेहा बोरा को मंडी हाउस के पास हिरासत में लिया गया। वह वामपंथी कार्यकर्ताओं के साथ कनॉट प्लेस की ओर बढ़ रही थीं। दीपके और बोरा को अलग-अलग स्थानों पर हिरासत में लिए जाने पर प्रदर्शन को नेतृत्व देने वाले दो प्रमुख चेहरों की मौजूदगी रहेगी या नहीं, ये बड़ा सवाल है। सीजेपी के सौरव दास और आशुतोष रांका पहले से ही जुडिशल कस्टडी में हैं।हालांकि, आंदोलन का भविष्य केवल नेताओं की हिरासत से तय नहीं होगा। छात्र संगठनों की स्थानीय इकाइयां, विश्वविद्यालयों के कार्यकर्ता और अन्य सहयोगी समूह विरोध को जारी रखने की क्षमता रखते हैं। सूत्रों के मुताबिक, छात्र संगठन एक नवंबर तक आंदोलन जारी रखने की रणनीति पर काम कर सकते हैं। इसकी स्वतंत्र पुष्टि और संगठनों की औपचारिक घोषणा अभी जरूरी है।
स्टालिन ने उठाए सवाल, केजरीवाल पहले भी कर चुके हैं सरकार पर हमला
इस पूरे घटनाक्रम का असर दिल्ली से बाहर भी राजनीतिक स्तर पर दिख रहा है। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने पूछा कि नेहा बोरा और अभिजीत दीपके को हिरासत में लिया गया हैं और वे अभी कहां हैं। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल पहले भी CJP नेताओं की हिरासत पर तीखी प्रतिक्रिया दे चुके हैं।1 नवंबर की रैली पर विपक्ष की नजर
आंदोलन की राजनीतिक दिशा के लिहाज से एक नवंबर अहम तारीख है। INDIA गठबंधन ने दिल्ली के रामलीला मैदान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन करने की योजना बनाई है। एक अक्टूबर की बैठक के बाद विपक्षी नेताओं ने इस रैली की घोषणा की थी। इसके बाद 14 अक्टूबर की बैठक में भी आंदोलन जारी रखने और लोकतंत्र की बहाली के मुद्दे को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई।- सूत्रों के मुताबिक, छात्र संगठनों के बीच एक नवंबर तक विरोध जारी रखने को लेकर चर्चा है। यदि यह रणनीति आगे बढ़ती है तो आने वाले दिनों में छोटे प्रदर्शन, प्रतीकात्मक विरोध, छात्र संगठनों की लामबंदी और विपक्षी नेताओं के कार्यक्रम आंदोलन के प्रमुख हिस्से हो सकते हैं। हालांकि, इसे अभी संगठनों की घोषित और अंतिम रणनीति नहीं माना जा सकता।
- विपक्ष पहले ही चुनाव आयोग की भूमिका, मतदाता सूची में बदलाव और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठा रहा है। एक नवंबर की रैली इन मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में फिर से प्रमुखता देने का अवसर बन सकती है।
आगे की रणनीति में तीन सवाल अहम
- पहला, क्या आंदोलन का केंद्र तिरंगा और नागरिक अधिकार बनेंगे? शुक्रवार के कार्यक्रम से संकेत मिलता है कि प्रदर्शनकारी अब ऐसे प्रतीकात्मक तरीकों को भी इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनके जरिए वे शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का सवाल उठा सकें।
- दूसरा, क्या छात्र संगठन हिरासतों के बावजूद आंदोलन जारी रखेंगे? नेहा बोरा की हिरासत और छात्र संगठनों की सक्रियता के बाद यह देखना अहम होगा कि प्रदर्शन कितना जारी रह सकता है।
- तीसरा, क्या विपक्षी दल एक साझा कार्यक्रम पर टिक पाएंगे? एक नवंबर की रैली की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि कांग्रेस समेत INDIA गठबंधन के घटक दल, छात्र संगठन और नागरिक समूह साझा मुद्दों पर कितनी एकजुटता दिखाते हैं। हालांकि राहुल गांधी पहले ही कह चुके हैं चुनाव आयोग के मुद्दे पर हो रहे प्रदर्शन एक ही हैं।



