छावा, स्‍काई फोर्स और गेम चेंजर पर लगे 'ब्‍लॉक बुकिंग' के गंभीर आरोप, जानिए कितनी फर्जी है ये 'कमाई'

छावा, स्‍काई फोर्स और गेम चेंजर पर लगे 'ब्‍लॉक बुकिंग' के गंभीर आरोप, जानिए कितनी फर्जी है ये 'कमाई'
फिल्‍मों के बॉक्‍स ऑफिस कलेक्‍शन पर बीते कुछ साल से लगातार सवाल उठ रहे हैं। आरोप लगते हैं कि मेकर्स बढ़ा-चढ़ाकर फिल्‍मों की कमाई बताते हैं, ताकि दर्शक थ‍िएटर तक पहुंचे। टिकट बुकिंग प्‍लेटफॉर्म्‍स पर शोज हाउसफुल दिखते हैं, लेकिन जब लोग सिनेमाघर पहुंचते हैं तो वहां सीटें खाली होती हैं। इसी कड़ी में 'ब्‍लॉक बुकिंग' और 'कॉरपोरेट बुकिंग' जैसे शब्‍द भी सामने आए। ट्रेड एनालिस्ट कोमल नाहटा ने अक्षय कुमार और वीर पहाड़‍िया की 'स्काई फोर्स' के निर्माताओं पर अच्‍छी बॉक्स-ऑफिस रिपोर्ट दिखाने के लिए ब्‍लॉक बुकिंग का आरोप लगाया। यही आरोप विक्‍की कौशल की शुक्रवार, 14 जनवरी को रिलीज हो रही 'छावा' पर भी लग रहे हैं। राम चरण की पिछली रिलीज 'गेम चेंजर' को लेकर भी ऐसे दावे हुए थे।

यह भी दिलचस्‍प है कि विक्की कौशल और रश्मिका मंदाना की 'छावा' के निर्माता भी 'मैडॉक फिल्म्स' हैं, जो 'स्‍काई फोर्स' के भी प्रोड्यूसर हैं। जाहिर है इन आरोपों से पूरी भारतीय फिल्‍म इंडस्‍ट्री की विश्वसनीयता दांव पर लगी है। फिर चाहे वो बॉलीवुड की फिल्‍में हो या साउथ सिनेमा की। लेकिन असल में यह माजरा क्‍या है, आइए इसे समझते हैं।

1970 और 80 के दशक में होती है टिकटों की 'फीडिंग'


ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श ने 'हिंदुस्‍तान टाइम्‍स' से बातचीत में बताया कि फिल्म इंडस्‍ट्री के बड़े नाम 1970 और 80 के दशक में भी कमाई के आंकड़ों के साथ हेराफेरी करते थे। वह कहते हैं, 'उन दिनों, ब्लॉक बुकिंग को 'फीडिंग' कहा जाता था। मैंने उस दौर के एक टॉप एक्‍टर से बात की, वह बताते हैं कि लोगों में एक धारणा बनाने के लिए कुछ सिनेमाघरों में टिकट खरीद लिए जाते थे। ताकि हाउसफुल का बोर्ड लग सके। तब फ‍िल्में एकसाथ रिलीज नहीं होती थीं। तब ऐसा होता था कि आज दिल्ली में फ‍िल्म का प्रीमियर है और एक हफ्ते बाद मुंबई में। लेकिन जनता इन चर्चाओं से रूबरू होती थी।'

टिकट तो बिक रहे हैं, पर सिनेमाघर हैं खाली, फिर नुकसान किसे?


हालांकि, आंकडों की इस हेराफेरी में एग्‍जीबिटर्स यानी सिनेमाघर मालिकों को कोई शिकायत नहीं होती। ऐसा इसलिए कि तकनीकी रूप से उनकी टिकटें तो बिकती ही हैं। हां, यह अलग बात है कि ये टिकटें आम दर्शक की बजाय कोई और खरीदता है। तरण आदर्श कहते हैं, 'आज कल यह काम बड़े लेवल पर हो रहा है। इससे थ‍िएटर मालिक खुश हैं। अब चाहे फिल्‍म का निर्माता खुद टिकट खरीद रहा हो, या एक्‍टर, या स्टूडियो, टिकट बिक तो रहे हैं।'

क्‍या होती है ब्लॉक बुकिंग या कॉरपोरेट बुकिंग?


ट्रेड एनालिस्‍ट अतुल मोहन बताते हैं, 'इसे ऐसे समझ‍िए कि अगर कोई एक्‍टर 20 ब्रांड का विज्ञापन करता है तो वह एक ब्रांड से, उदाहरण के लिए, अपनी नई रिलीज फिल्म के 10,000 टिकट खरीदने के लिए कहते हैं। बदले में वो विज्ञापन की अपनी फीस में कुछ रियायत दे देता है या फिर मुफ्त में विज्ञापन शूट करता हैं। इसका मतलब है कि 10,000 टिकट कानूनी रूप से बिके हैं। अब भले ही जब शो शुरू हो तो थिएटर अंदर से खाली हो जाए। इसे कॉरपोरेट बुकिंग कहते हैं।'

अतुल आगे समझाते हैं, 'इसी तरह ब्लॉक बुकिंग होती है। जहां कोई निर्माता, एक्‍टर या स्टूडियो अपनी जेब से कई सीटों के लिए पैसे खर्च करते हैं। वो खुद ही अपनी फिल्‍म के टिकट खरीद लेते हैं। दोनों ही मामलों में, जब आप टिकट बुकिंग ऐप खोलते हैं, तो देखते हैं कि सिनेमाघर तेजी से भर रहे हैं। इससे दर्शकों में फिल्‍म को लेकर पॉजिटिव सोच बनती है।'

'गेम चेंजर' ने असल में कितना कमाया?


बीते दिनों रिलीज हुई राम चरण और कियारा आडवाणी 'गेम चेंजर' के मेकर्स पर भी इस रणनीति का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया। निर्माताओं ने दावा किया कि इस फिल्‍म ने दुनियाभर में 186 करोड़ रुपये की कमाई की। लेकिन समझा जाता है कि इसकी असली कमाई 80 करोड़ रुपये थी!

कुणाल कोहली बोले- यह सिर्फ असलियत से दूर रखने का तरीका


हाल ही, 'हम तुम' जैसी फिल्‍म के डायरेक्‍टर कुणाल कोहली ने ब्लॉक बुकिंग को 'बकवास' कहा। यूट्यूबर अलीना गांधी से बातचीत में कुणाल बोले, 'मतलब हम फिल्म बनाते हैं, हम फिल्‍म रिलीज करते हैं और फिर हम सिर्फ दिखाने के लिए टिकट भी खरीदते हैं? आप इसलिए ऐसा कर रहे हैं, क्योंकि आप अहंकार में हैं। आप किसी स्टार को लाड़-प्यार दिखाना चाहते हैं और उसे असलियत नहीं दिखाना चाहते। या फिर आप उस डायरेक्‍टर या प्रोड्यूसर को पैम्‍पर करना चाहते हैं।'

श‍िबाशीष ने माना- ये आम दर्शकों से धोखाधड़ी है


प्रोड्यूसर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष शिबाशीष सरकार मानते हैं कि यह आम जनता के साथ धोखाधड़ी है। वह कहते हैं, 'मुझे लगता है कि आखिरकार जो हो रहा है, उससे इंडस्ट्री की साख कम हो रही है। यहां एकमात्र तर्क यह है कि आप 'डिमांड' को लेकर धारणा बना रहे हैं।'

सबसे बड़ा सवाल- इसे ट्रैक करेंगे कैसे?


श‍िबाशीष सरकार ने आगे कहा, 'दुनिया भर के विकसित बाजारों में, रेन्ट्रैक (कलेक्‍शन पर नजर रखने के लिए) जैसी व्यवस्थाएं हैं। दुर्भाग्य से, भारत में ऐसा नहीं हुआ है। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन ये चीजें अब बहुत ज्‍यादा हो रही हैं। इसलिए, भले ही आपको फर्जी कलेक्‍शन को पकड़ने के लिए कोई सिस्टम मिल जाए, लेकिन आप कैसे जान पाएंगे कि कौन धोखाधड़ी करके बड़ी मात्रा में टिकट बुक कर रहा है? आप हर थिएटर के अंदर सीसीटीवी कैमरे तो नहीं लगा सकते।'

बहरहाल, इन सारे आरोपों पर जब HT ने मैडॉक फ‍िल्म्स के संस्थापक दिनेश विजान से संपर्क करने की कोश‍िश की, तो उनकी ओर से फिलहाल कोई जवाब नहीं मिला।
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