सलीम खान ने बेटे अरबाज खान के शो The Invincibles with Arbaaz Khan में बताया था कि उनके पास कुछ करने को नहीं था। उन्होंने बीए के बाद एमए जॉइन कर लिया था। तब वह इंदौर में थे। कॉलेज के दौरान ही उन्हें फिल्में ऑफर होने लगी थीं। एक बार तो 'लैला मजनू' और 'बाजार' जैसी फिल्में बनाने वाले के अमरनाथ आए और उनसे बोले कि तुम मुंबई चलो मैं तुम्हे एक्टर बना दूंगा। तभी उन्होंने एक हजार दिए और इस तरह वह मुंबई आ गए।
55 रुपये के कमरे में गुजारे थे दिन
88 साल के सलीम खान ने बताया कि वह शुरुआत में मरीना गेस्ट हाउस में रहते थे। तब उन्होंने खूब पापड़ बेले थे। तब 55 रुपये उन्हें एक बेड के कमरे के देने पड़े थे। शुरुआत में उन्हें छोटे छोटे रोल मिले और फिर ऐड्स भी करने लगे थे।
सलीम खान ने बतौर एक्टर भी काम किया
एक दिन सलीम खान ने जब खुद को स्क्रीन पर देखा तो उन्हें ये एहसास हुआ कि वह बड़े सुपरस्टार नहीं बन सकते। उन्हें लगा कि वह इस फील्ड में कभी दिलीप कुमार नहीं बन सकता। ऐसे में उन्होंने सोच लिया कि उन्हें इंडस्ट्री में कुछ और तलाशना पड़ा।
दोस्तों के लवलेटर लिखा करते थे सलीम खान
दोस्तों के लवलेटर लिखा करते थे सलीम खान
सलीम खान ने बताया कि जब वह कॉलेज में थे तो दोस्त उनसे लवलेटर लिखवाया करते थे। जब वह मुंबई आए तो दोस्त के ब्रेकअप तक हो गए। फिर जब उन्हें एहसास हुआ कि वह एक्टर बनने के लिए फिट नहीं है तो उन्होंने राइटिंग में करियर संवारा।
बतौर लेखक सलीम खान की पहली फिल्म
साल 1965 में ब्रिज सरदाना के लिए उन्होंने पहली बार एक फिल्म लिखी थी। ये वही फिल्म थी जिसे सलीम खान ने दादा मुनि यानी अशोक कुमार को अपनी कहानी बेची थी। उन्होंने अशोक कुमार को अपनी ये कहानी सुनाई थी तो सुनते ही दादा मुनि ने उनके हाथ में पैसे थमा दिए और कह दिया कि आज से ये कहानी उनकी हो गई।
स्क्रीन राइटर्स को सलीम-जावेद ने दिलवाई पहचान
सलीम खान और जावेद खान की जोड़ी वो है, जिन्होंने इंडस्ट्री में लेखकों को इज्जत दिलवाई। दोनों ने पार्टनरशिप में करीब 12 साल काम किया। 'सीता और गीता', 'हाथी मेरे साथी', 'यादों की बारात', 'जंजीर', 'हाथ की सफाई', 'दीवार', 'शोले', 'क्रांति', 'त्रिशूल', 'जमाना', 'मिस्टर इंडिया' से लेकर कई फिल्में साथ में लिखीं। सलीम खान ने हमेशा से इंडस्ट्री में कहा था कि एक दिन राइटर को भी हीरो की तरह सैलरी मिलेगी। कई बार तो लोग उनकी बातों को हवा में लेते थे। तब वह कहते थे कि अगर दिलीप कुमार 12 लाख रुपये ले सकते हैं तो राइटर क्यों नहीं। उनका मानना था कि फिल्मों के चलने के पीछे सिर्फ पहले हीरो को ही वजह माना जाता था। राइटर्स का नामो निशान नहीं होता था। उन्होंने शुरुआत में ही सोच लिया था कि वह राइटर्स को जो सम्मान मिलना चाहिए वो जरूर दिलवाएंगे।











