97 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहा, अमृता प्रीतम के साथ 40 साल रहे

97 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहा, अमृता प्रीतम के साथ 40 साल रहे

आज मशहूर कवि और चित्रकार इमरोज का 97 साल की उम्र में अपने मुंबई के घर में निधन हो गया है। वे कुछ समय से उम्र संबंधी परेशानियों से गुजर रहे थे। ​​​​​​इमरोज का मूल नाम इंद्रजीत सिंह था। इमरोज अमृता प्रीतम के साथ अपने रिश्ते के बाद काफी लोकप्रिय हो गए थे। हालांकि, दोनों ने कभी शादी नहीं की, लेकिन 40 साल तक एक-दूसरे के साथ ही रहते थे।

इमरोज के निधन की खबर सुनते ही कनाडा के इकबाल महल ने शोक व्यक्त किया और बताया कि वे उन्हें 1978 से व्यक्तिगत रूप से जानते थे। उन्होंने यह भी कहा कि अमृता उन्हें 'जीत' कहा करती थीं।

इमरोज ने कई प्रसिद्ध एलपी के कवर डिजाइन किए थे
इमरोज का जन्म साल 1926 में लाहौर से 100 किलोमीटर दूर एक गांव में हुआ था। इमरोज ने जगजीत सिंह की 'बिरहा दा सुल्तान' और बीबी नूरन की 'कुली रह विच' सहित कई प्रसिद्ध एलपी के कवर डिजाइन किए थे।

इमरोज- अमृता की कहानी
इमरोज की मुलाकात अमृता से एक कलाकार के माध्यम से हुई जब अमृता अपनी किताब का कवर डिजाइन करने के लिए किसी की तलाश कर रही थीं। अमृता प्रीतम ने पंजाबी और हिंदी में कविताएं और उपन्यास लिखे। उन्होंने 100 से ज्यादा किताबें लिखीं। उनकी चर्चित कृतियां कुछ यूं हैं- पांच बरस लंबी सड़क, पिंजर, अदालत, कोरे कागज, उन्चास दिन, सागर और सीपियां।

1935 में अमृता की शादी लाहौर के कारोबारी प्रीतम सिंह से कर दी गई थी। दोनों के बच्चे भी हुए। 1960 में उन्होंने पति को छोड़ दिया। फिर अमृता को मशहूर गीतकार साहिर लुधियानवी से प्रेम हुआ, लेकिन साहिर की जिंदगी में एक महिला के आने से दोनों एक दूजे के नहीं हो सके। इसके बाद अमृता की जिंदगी में चित्रकार व लेखक इमरोज आए जिन्हें अमृता से प्रेम हुआ। कहा जाता है कि अमृता अक्सर साहिर का नाम इमरोज की पीठ पर अपनी उंगलियों से लिखती थीं। इमरोज इस बात को जानते भी थे, मगर वह अपने प्रेम पर ज्यादा यकीन करते थे। वह कहतीं थीं, साहिर मेरी जिंदगी के लिए आसमान हैं और इमरोज मेरे घर की छत।

इमरोज और अमृता के बीच सात साल का फर्क था
कुछ वर्ष पहले इमरोज ने अमृता और साहिर के रिश्ते के बारे में एक खुलासा किया था। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा- मुझे नहीं लगता कि वास्तव में अमृता और साहिर लुधियानवी एक-दूसरे से प्यार करते थे। जब साहिर किसी मुशायरे में शामिल होने के लिए आए थे, तब के अलावा वह कभी भी अमृता से मिलने दिल्ली नहीं आए। वहीं अमृता भी कभी उनसे मिलने मुंबई नहीं गईं, जहां वह रहते थे। साहिर पारिवारिक व्यक्ति नहीं थे और अमृता को इसका एहसास हो गया था। मैं और अमृता दोस्तों की तरह अलग-अलग कमरों में रहते थे और खर्चा साझा करते थे।

अमृता और इमरोज के बीच उम्र में सात साल का फासला था। साल 2005 में अमृता का निधन हो गया। अमृता ने अपनी मृत्यु से पहले इमरोज के लिए एक कविता लिखी 'मैं तुम्हें फिर मिलूंगी।' वहीं, इमरोज उनकी मृत्यु के तुरंत बाद कवि बन गए थे। उन्होंने अमृता पर एक प्रेम कविता पूरी की-'उसने जिस्म छोड़ा है, साथ नहीं।'

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