भोपाल। जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी और भारतीय हिंदी परिषद प्रयागराज के सहयोग से दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का आयोजन मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में किया जा रहा है। शनिवार को कार्यक्रम के शुभारंभ अवसर पर प्रो. राजेश लाल मेहरा, प्रो नंदकिशोर पांडेय, भारतीय हिंदी परिषद, प्रयागराज के प्रो. पवन अग्रवाल, प्रो सूर्य प्रसाद दीक्षित, अकादमी निदेशक डा. धर्मेंद्र पारे एवं अन्य कई अध्येता और शोधार्थी उपस्थित रहे। मुख्य वक्ता हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली के निदेशक प्रो. नंदकिशोर पांडेय ने कहा कि हमें संतों की वाणी परंपरा में रैदास को देखना होगा। हमारी भारतीय संस्कृति में नव की नहीं पुनर्नवा की चर्चा होती है। हमने कबीर के उन्हीं पदों को पढ़ा, जिसमें वो समाज की कुरीतियों पर कुठाराघात करते हैं। हम उनके द्वारा रचित भक्ति, योग और दर्शन पर दृष्टिपात करना भूल जाते हैं। संतों ने समय-समय पर समाज को दिशा देने का कार्य हर पहलू में किया है। अत: हमें सभी पक्षों का अध्ययन करना होगा।
संतों ने अपना कार्य बखूबी किया है : प्रो. राजेश लाल मेहरा
मुख्य अतिथि और मप्र लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष प्रो. राजेश लाल मेहरा ने कहा कि संतों की वाणियां सदैव पवित्र करती हैं और इस कार्य को संतों ने बखूबी किया है। एक लम्बी श्रृंखला है संतों की जिस पर कार्य होना बाकी है। हमारी इस परंपरा में लोक संतों का भी बड़ा योगदान रहा है, जो वाचिक परंपरा की श्रृंखला है वो अपने आप में अद्भुत है। हमारे यहां एकत्व की भावना सिर्फ संतों में ही नहीं बल्कि पूरे देश में रही है और हमेशा से आस्थापरक रही है। भारत संतों का देश है, इसका ब्रांड अध्यात्म है और संतों की वाणियां इसकी ब्रांड एम्बेसडर हैं। वर्तमान समय मे लोगों को लोक सेवक बनना है, अगर वे लोक को नहीं समझना चाहते। भारत को अगर समझना है तो यहां के लोक को समझना बहुत आवश्यक है।
सभी संतों ने किया पाखंड का विरोध
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि संत साहित्य विवादों के घेरे में है और यह नई व्याख्या चाहता है। संतों की श्रेणी में बहुत से ऐसे संत है जिनकी रचना में सगुण और निर्गुण दोनों ही तत्व स्पष्टता से दिख जाते हैं। पिछड़े वर्गों में अंदर तक घर कर गई हीनता और आत्मग्लानि की भावना को दूर करने में इन संतों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। पाखंड का विरोध संपूर्ण संत समाज ने किया। यदि रैदास की बात करें तो वे शास्त्र को लोक बनाने का कार्य करते हैं।
प्रथम अकादमी सत्र में प्रो. श्रीराम परिहार ने कहा कि भक्ति काल ने हमारी दृष्टि में जो सबसे बड़ा काम किया है वो संस्कृति उन्मेष का है। उन्होंने कहा कि सूत्र तो हमारी पुरांतता के लिए है, लेकिन संतों ने जो पुनर्नवा रचा उससे हमारा सांस्कृतिक पुनर्जागरण हुआ। इसके बाद अन्य कई सत्रों में वक्ताओं ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम में स्वागत वक्तव्य अकादमी निदेशक डा. धर्मेंद्र पारे ने दिया।
भजन में गूंजी संतवाणी
जनजातीय संग्रहालय में शाम को अनुभूति शर्मा, नई दिल्ली द्वारा संत रैदास एकाग्र द्वारा भजनों की प्रस्तुति दी गई। उन्होंने मैं गाऊं पद गाऊं..., संत रविदास के दोहे..., लालौन फकीर जात गैलो बोले..., भीम गीत (रविदास गीत).., जमुना किनारे मोरा गांव.., बेगम पुरा... (संत रविदास गीत).. एवं अन्य भजनों की प्रस्तुति दी।











