भोपाल। जब बच्चे हिंदी पढ़ ही नहीं रहें हैं तो सुधारेंगे कैसे। हर कोई अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम में पढ़ाना चाहता है, इसके लिए पूरा एजुकेशन सिस्टम जिम्मेदार है। आजकल परीक्षाओं में आबजेक्टिव सवाल पूछे जाते हैं। इससे कोई किसी के ज्ञान का पता कर सकता है, हमारे समय में एक सवाल पर उत्तर पांच पन्ने के हुए करते थे। हम एजुकेटेड हैं लर्निंग नहीं। यह कहना है पद्मश्री सुरेंद्र शर्मा का, जो कि रविवार को जनजातीय संग्रहालय में आए हुए थे। मौका था आयकर विभाग मप्र एवं छग तथा संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से जश्न-ए-अदब साहित्योत्सव कल्चरल कारवां विरासत का। इस दौरान विभिन्न कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
भाषाओं में झगड़ा करना 14 सितंबर ने सिखाया
कवि सुरेन्द्र शर्मा ने कहा कि आज के समय में क्षेत्रीय भाषा आठवीं कक्षा के बाद खत्म हो जाती है। मैं मानता हूं कि भाषाओं में झगड़ा करना 14 सितंबर ने सिखाया है। पूरे संसार की भाषाओं का एक दिन कर देना चाहिए। यह दिक्कत तब हुई है, जब राजनीति ने भाषाओं को अपने हाथ में लिया है और फिर भाषाओं के आधार पर प्रांत बनाएं। उन्होंने कहा कि हिंदी बोलने में आसान हैं लिखने में कठिन, उसी तरह अंग्रेजी बोलने में कठिन और लिखने में आसान है।
शिक्षा नीति में बदलाव करें
कार्यक्रम में पद्मश्री कवि व प्राध्यापक अशोक चक्रधर ने भी शिरकत की। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति बहुत ही अच्छी है, लेकिन नई शिक्षा नीति में भाषा को लेकर पुनर्विचार के लिए हम प्रस्तावित करना चाहते हैं। बच्चों को क्लास में हिंदी के भाषा के साथ उनकी स्थानीय भाषा भी सिखानी चाहिए और अंग्रेजी तो पीछा ही नहीं छोड़ती है। इसलिए मेरा मानना है कि शिक्षा नीति में बदलाव करना चाहिए।
हमारी मौलिकता को निगल रहा एआइ
राजभाषा हिंदी पर अशोक चक्रधर ने अपने विचार रखते हुए कहा कि गांधी जी ने कहा था कि जिस राष्ट्र के पास अपनी कोई भाषा नहीं होती वो राष्ट्र गूंगा होता है। इस धारणा को चीनियों ने व्यावहारिकता के साथ अपनाया था। इसके बाद हिंदी संपर्क की भाषा रही, लेकिन काम-काज अंग्रेजी में ही हुआ करते थे। लेकिन नेहरू समझदार थे, उन्होंने कहा कि हम काम राजभाषा में ही करेंगे। समस्या से थी कि हिंदी में शब्द ही नहीं थे, तो काम कैसे करेंगे और अलग शब्द ले भी आएंगे तो कब तक और कहां चला पाएंगे। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को ऊबड़-खाबड़ जानकारी देने वाला बताया। साथ ही कहा कि एआई कई लोगों की नौकरी खा गई, अब हमारी मौलिकता भी खा रही है।











