अमेरिका दौरे पर पीएम मोदी, राष्ट्रपति ट्रंप से न्यूक्लियर पावर पर हो सकती है बात
नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फ्रांस के बाद अमेरिका के दौरे पर पहुंचे हैं। राष्ट्रपति मैक्रों उन्हें विदा करने के लिए खुद एयरपोर्ट पर पहुंचे। भारत-फ्रांस अडवांस्ड मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) और स्मॉल मॉड्यूल रिएक्टर साझा तौर पर विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ गए हैं। अब सवाल है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के साथ द्विपक्षीय बातचीत में भी क्या PM न्यूक्लियर एनर्जी के अजेंडे पर बात करेंगे? सरकार की ओर से लगातार इस तरह के संकेत दिए जा रहे हैं कि यह अमेरिका के साथ बातचीत का एक अहम एजेंडा हो सकता है।
एनर्जी को लेकर दोनों नेताओं के बीच हो सकती है बात
मंगलवार को इंडिया एनर्जी वीक-2025 के दौरान केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्वीकार किया कि अगर एनर्जी को लेकर दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय बातचीत नहीं होती है, तो उन्हें हैरानी होगी। जब उनसे पूछा गया कि ट्रंप से बातचीत न्यूक्लियर एनर्जी, खासतौर से SMR को लेकर बात होगी, तो इस पर उन्होंने कहा, हां ये एजेंडे में है। इसके अलावा, अवैध प्रवासी भारतीयों की वापसी, हथियारों की खरीद और टैरिफ के मुद्दे पर भी बात हो सकती है। वाइट हाउस के बयान के मुताबिक, पैरिस AI समिट के इतर अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD वेंस और PM ने इस तरह की चर्चा की थी कि अमेरिका किस तरह न्यूक्लियर तकनीक में निवेश के लक्ष्य को लेकर भारत की मदद कर सकता है।
न्यूक्लियर एनर्जी को लेकर गंभीर है सरकार
सरकार न्यूक्लियर एनर्जी को लेकर गंभीर है। इस साल के बजट में परमाणु ऊर्जा मिशन की शुरुआत की गई है, जिसका लक्ष्य स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) के रिसर्च और विकास पर केंद्रित है। सरकार ने इस पहल के लिए 20,000 करोड़ रुपये तय किए हैं। लक्ष्य यह भी है कि 2033 तक कम से कम पांच SMR स्वदेशी रूप से डिवेलप करने हैं। भारत का लक्ष्य है कि अगले दो दशकों में मौजूदा न्यूक्लियर पावर कपैसिटी 82 गीगावाट से बढ़ाकर 100 गीगावाट की जाए।
न्यूक्लियर प्लांट को लेकर सवाल भी कम नहीं हैं। जानकार कहते हैं कि न्यूक्लियर प्लांट, सोलर प्लांट की तुलना में तीन गुना महंगा पड़ सकता है। बल्कि इसे स्थापित करने में छह साल तक लग सकते हैं। वहीं, साल 2010 में पास हुए Civil Liability for Nuclear Damage Act बिल में संशोधन को लेकर सिविल सोसाइटी और विपक्ष की ओर से विरोध दिख सकता है। जानकारों का मानना है कि इससे सप्लायर की जवाबदेही कम हो जाएगी, जो कि देश के हित में नहीं है।











