'नफरत फैलाने वाले भाषणों और गलतबयानी में अंतर'
पीठ ने कहा कि हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत वर्तमान रिट याचिका पर विचार करने को लेकर इच्छुक नहीं हैं, जो वास्तव में ‘कथित बयानों’ को संदर्भित करता है। इसके अलावा, भड़काऊ भाषण और गलतबयानी के बीच अंतर है। अगर याचिकाकर्ता को कोई शिकायत है, तो वे कानून के अनुसार इस मामले को उठा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर क्या कहा
दवा के सभी जोखिम बताना, प्रैक्टिकल नहीं: कोर्ट
कोर्ट ने कहा, 'यह व्यावहारिक नहीं है। अगर इसका पालन किया गया तो एक डॉक्टर 10-15 से ज्यादा मरीजों का इलाज नहीं कर सकेगा और कंस्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत मामले दर्ज हो सकते हैं।' याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि इससे मेडिकल लापरवाही के मामलों से बचने में मदद मिलेगी। बेंच ने कहा कि डॉक्टर सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से नाखुश हैं जिसमें मेडिकल पेशे को कंस्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के दायरे में लाया गया है।











