मालवा की जलवायु अब बाघ के अनुकूल

मालवा की जलवायु अब बाघ के अनुकूल
इंदौर। मालवा की जलवायु और हरियाली अब वन्यप्राणियों के अनुकूल होने लगी है। इसका प्रमाण ढाई महीने से महू-मानपुर वनक्षेत्र में बाघ की मौजूदगी है, जिसने यहां अपना नया अधिकार क्षेत्र बना लिया है। इसका कारण यह है कि जंगल में पर्याप्त जल स्रोत और वन्यप्राणियों की बढ़ती संख्या को माना जा रहा है।

यह पहला अवसर है जब यहां के जंगलों में बाघ की मौजूदगी इतनी लंबे समय तक देखी गई है। इस वजह से ग्रामीण काफी डरे हुए हैं। उनके मन से बाघ का भय खत्म करने के लिए वन विभाग नया प्रयोग करने जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार बाघ की मौजदूगी इको सिस्टम बेहतर होने का प्रमाण है। यह बात ग्रामीणों को बताने के लिए गांवों में जागरूकता अभियान चलाया जाएगा, ताकि बाघ को नुकसान न पहुंचाया जा सके।

इंस्टीट्यूट आफ वाइल्ड लाइफ देहरादून ने 2007 में रातापानी-खिवनी-उदयनगर-चोरल और बड़वाह के बीच सात सदस्यीय टाइगर फैमिली होने का दावा किया था। संस्थान ने पूरे इलाके को बाघ कारिडोर घोषित किया था। इसके बाद इलाके में बाघ की मौजूदगी 2012 और 2015 में भी नजर आई थी। 2015 में तीन से चार दिन महू में आने वाले बड़िया-मांगल्या और बड़गोंदा में मूवमेंट देखा गया था।

साल 2021 में बाघ गणना के दौरान पंजों और नाखूनों के निशान व विष्ठा मिली थी। उसके बाद लगातार इंदौर-चोरल, महू और मानपुर के जंगलों में बाघ नजर आता रहा है। इनका मूवमेंट का पता लगाने के लिए जगह-जगह ट्रैप कैमरे लगेंगे।

करेंगे जागरूक

महू-मानपुर में आने वाले गांवों में बाघ को लेकर दहशत है। अब वन विभाग को चिंता सताने लगी है कि ग्रामीण कहीं बाघ को नुकसान न पहुंचा दें या कोई शिकारी गिरोह न सक्रिय हो जाए। इसके लिए विभाग दोनों रेंज में आने वाली वन समिति और सरपंचों के माध्यम से ग्रामीणों को जागरूक करने का जोर दे रहे हैं। जल्द ही पूर्व वन अफसरों की टीम बनाएंगे, जो गांवों में जाकर बाघ को लेकर महत्वपूर्ण बातें बताएंगे।

आज मैराथन

बाघ को लेकर शहरवासियों को जागरूक करने के लिए वन विभाग ने शनिवार को विश्व बाघ दिवस पर मैराथन रखी है, जो इंदौर वनमंडल कार्यालय से शुरू होगी। शिवाजी वाटिका, पलासिया, गीताभवन होते हुए नवरतनबाग पहुंचेगी। इस दौरान लोगों को बाघ प्रिंट वाली टी-शर्ट बांटेंगे। वहीं रालामंडल अभयारण्य में बाघ आधारित पेंटिंग प्रतियोगिता भी होगी। जागरूकता को लेकर वन्यप्राणी विशेषज्ञ बच्चों को महत्वपूर्ण जानकारी देंगे।
प्रदेश में बाघों की स्थिति

- 2006 : 300

- 2010 : 257

- 2014 : 388

- 2018 : 526

- 2022: 540

देश में बाघों की स्थिति

- 2006 : 1411

- 2010 : 1706
- 2014 : 2226

- 2018 : 2967

- 2022: 3167

इस वर्ष यहां बाघ आया नजर

- 8 मई को सबसे पहले आर्मी वार कालेज परिसर के कैमरे में नजर आया।

- 14 मई को मलेंडी गांव के ज्ञानसिंह ने उसे जंगल की ओर जाते हुए देखा।

- 16 मई को मलेंडी गांव में गाय का शिकार किया।
- 17 मई को शिकार की जगह पर लगाए गए कैमरे में नजर आया।

- 18 मई को दोबारा उसी शिकार के पास कैमरे में ट्रैप हुआ।

- 23 मई को फिर गाय का शिकार किया।

- 24 मई को वन विभाग के कैमरे में पगडंडी से जाते हुए दिखा।

- 6 जून को नंदलाई घाटी में सड़क से जा रहे लोगों ने देखा और वीडियो बनाए।

- 9 जून को पीथमपुर के संजय जलाशय के पास भरदला गांव के जंगल में नीलगाय का शिकार किया।

- 18 जून को मलेंडी गांव के जंगल में बुजुर्ग पर किया हमला।

- 23 जून को बड़गोंदा नर्सरी में बाघ के पग चिह्न मिले थे।

- 3 जुलाई को जामनिया में गाय का शिकार किया।

- 6 जुलाई को फिर से लोगों को बड़गोंदा नर्सरी में नजर आया।

ऐसे बनाते हैं अधिकार क्षेत्र

- पेड़ों पर नाखूनों के निशान बनाते हैं।

- जगह-जगह पेशाब व विष्ठा करते हैं।

- शिकार करते हैं।

- लगातार जंगल में घूमते रहते हैं।

शिकारियों पर निगरानी जरूरी

बाघ की मौजूदगी पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर है। बाघों के संरक्षण को लेकर वन विभाग के सामने बड़ी चुनौती क्षेत्र में शिकारियों की सक्रियता पर निगरानी रखना है। इसके लिए ग्रामीण, वनकर्मियों और सूचना तंत्र को मजबूत करना होगा। यहां तक कि जंगल में जल स्रोत को भी बचाना होगा। साथ ही हरियाली को निरंतर बढ़ते रहने की जरूरत है।

-डा. पीसी दुबे, पूर्व पीसीसीएफ

ग्रामीणों को बताएंगे बाघ का महत्व

ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए गांवों में परिचर्चा-नुक्कड़ नाटक का सहारा लिया जाएगा। समय-समय पर वन समितियों व सरपंचों के माध्यम से ग्रामीणों की बैठक लेंगे, ताकि बाघ को बचाया जा सके।

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