भोपाल को झीलों की नगरी के नाम से जाना जाता है। लेकिन, शहर की एक ऐसी झील है जो खत्म होने की कगार पर आ गई। भोपाल में चार इमली स्थित जवाहर बाल उद्यान झील के हालत बदतर हो गए हैं। झील सीवेज के पानी के डिस्चार्ज और कई तरह के तत्वों से दूषित हो रही है। इस झील को साफ करने का जिम्मा भोपाल की 12वीं कक्षा की छात्रा एशना अग्रवाल ने उठाया है। एशना ने जवाहर जवाहर बाल उद्यान झील और उसके आसपास के क्षेत्र को पुनर्जीवित करने की परियोजना शुरू की है, जो लगभग 49,224 वर्ग मीटर में फैली हुई है।
जिस तकनीक से झील की सफाई की जाएगी, वह भोपाल में पहली बार 5 जून को वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे पर इस्तेमाल की जाएगी। एशना ने बताया कि फ्लोटिंग वेटलैंड्स, फ्लोटिंग एरेटर और बायो फिल्टर जैसी तकनीकों के जरिए इस झील को पुनर्जीवित किया जा सकता है। एशना ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए बताया कि इससे पहले यह तकनीक इंदौर में इस्तेमाल की जा चुकी है, जिसके रिजल्ट आगे दिखाई देंगे। एशना कहती हैं कि इस झील का पानी 'डी' ग्रेड का पानी है।
फ्लोटिंग वेटलैंड्स एक नेचुरल तरीका
एशना बताती हैं कि फ्लोटिंग वेटलैंड्स जो एक नेचुरल तरीका है। जिससे इस झील को पूरी तरह से शुद्ध किया जा सकेगा। सरल भाषा में समझे तो फ्लोटिंग वेटलैंड्स एक तरह का ढांचा होता है। जो पानी की सतह पर तैरते हैं। इन पर विशेष प्रकार के पौधे लगाए जाते हैं, जिनकी जड़ें पानी में लटकी रहती हैं। फ्लोटिंग वेटलैंड्स के पौधे पानी में मौजूद हानिकारक तत्वों को खाने का काम करते हैं। यह एक तरह के फिल्टर का काम करती हैं जिससे पानी के प्रदूषण का स्तर कम हो जाता है। वेटलैंड्स के पौधे ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं, जिससे पानी में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है, और यह मछलियों और अन्य जल जीवों के लिए फायदेमंद होता है।
पानी में ऑक्सीजन की गुणवत्ता बढ़ाएगा फ्लोटिंग एरेटर
फ्लोटिंग एरेटर जो एक तरह का फाउंटेन होता है। इनका काम पानी में ऑक्सीजन की गुणवत्ता को बढ़ाना होता है। एशना ने बताया कि पहले से ही कुछ एरेटर झील में मौजूद है। इसके अलावा उन्होंने बायो फिल्टर तकनीक के बारे में बताया कि फिल्टर जो एक प्रकार की जालियां होती है, जिससे कई तरह के दूषित कणों को झील में आने से रोका जा सकता है। एशना का कहना कि यह सारी तकनीक एक नेचुरल तरीका है, जिससे झीलों को साफ किया जा सकता है। यह न केवल जल की गुणवत्ता सुधरती है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहता है। एशना ने बताया कि इसका खर्च 25 लाख रुपए है। जिसके लिए वह कई प्राईवेट कंपनियों के सीएसआर से फंड लेंगी।
एशना के बारे में ...
- एशना ने गुजरात की 600 साल पुराने अगरिया समुदाय पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई है। इसमें बताया गया कि किस तरह से नमक बनाने से संबंधित काम करने में इन लोगों की जिंदगी पर क्या प्रभाव पड़ता है।
- एशना की बनाई हुई यह डॉक्यूमेंट्री 10 दिसंबर 2023 को COP 28 दुबई में भी दिखाई गई थी। भारत से यह एकमात्र डॉक्यूमेंट्री थी जो COP 28 में दिखाई गई थी। COP 28 का मतलब है Conference of the Parties 28 जो संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन पर आयोजित होने वाली वार्षिक बैठक है।











