इसमें कहा गया कि सिंधिया को प्रचार के लिए आमंत्रित किया गया था। इसका परोक्ष संदेश यही है कि वह (सिंधिया) पार्टी के अनुशासन में रहें। यहां की कार्य संस्कृति कांग्रेस की तरह नहीं है कि कोई खुद को पार्टी से ऊपर रखे और बयान देकर संगठन को घेरने का प्रयास न करें।
दिल्ली तक पहुंच गई सिंधिया की बात
पार्टी के सूत्र बताते हैं कि ज्योतिरादित्य के बयान को राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने भी गंभीरता से लिया है और उनकी सहमति के बाद ही संगठन का बयान सामने आया।
दरअसल, विजयपुर में भाजपा को मिली करारी पराजय का ठीकरा किस के सिर फोड़ा जाए, अब इसे लेकर राजनीति तेज हो गई है। पहले तो भाजपा ने यह कहकर पल्ला झाड़ने का प्रयास किया कि स्वतंत्रता के बाद से ही यह सीट कांग्रेस की रही है।
इसी बीच जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी विजयपुर हार पर सवाल उठाया तो हंगामा होना स्वाभाविक था। सिंधिया के यह कहने 'अगर मुझे बुलाया जाता तो मैं जरूर जाता' पर सत्ता- संगठन ने आपत्ति ली।
केंद्रीय नेतृत्व को बताया गया। वहां से हरी झंडी मिलने के बाद भाजपा की ओर से जारी जवाब में कहा गया कि विजयपुर विधानसभा उपचुनाव के स्टार प्रचारकों की सूची में ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम शामिल था।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा, प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद ने विजयपुर में प्रचार के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया को आमंत्रित किया था। पार्टी के इस बयान से सिंधिया का सच भी सामने आ गया।
समझिए सिंधिया ने क्यों बनाई उपचुनाव से दूरी
ग्वालियर-चंबल में वर्चस्व की लड़ाई कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए रामनिवास रावत विजयपुर से प्रत्याशी थे। उनकी जीत से केवल दो नेताओं का कद प्रभावित हो सकता था। पहला नाम विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर का था, क्योंकि उन्होंने ही रामनिवास को लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा में लाने के लिए तैयार किया था।
यदि रामनिवास रावत जीत जाते तो ग्वालियर- चंबल की राजनीति में नरेंद्र सिंह तोमर का कद बढ़ जाता। रामनिवास की जीत से दूसरे प्रभावित होने वाले नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया थे, यदि रामनिवास जीतते तो सिंधिया का क्षेत्र में वर्चस्व कम होता। इसी वर्चस्व की लड़ाई में ज्योतिरादित्य ने उपचुनाव से दूरी बनाए रखी।
पहले ज्योतिरादित्य के करीबी थे रामनिवास
रामनिवास रावत से ज्योतिरादित्य सिंधिया की हालिया नाराजगी की वजह बहुत पुरानी नहीं है। कांग्रेस में रहते हुए वह ज्योतिरादित्य के बेहद करीबी थे। वर्ष 2020 में जब ज्योतिरादित्य के साथ रामनिवास ने कांग्रेस नहीं छोड़ी, तो वह नाराज हो गए थे।
यही वजह है कि ज्योतिरादित्य ने भी विजयपुर उपचुनाव से दूरी बनाकर रखी, जिसका नुकसान भाजपा को उठाना पड़ा। छह बार कांग्रेस से विधायक रहे रामनिवास इसी वर्ष जुलाई में त्यागपत्र देकर भाजपा में आए थे और उन्हें मंत्री बनाकर उपचुनाव लड़वाया गया था।











