एयरपोर्ट पर चिट्ठियों की छंटाई
आजकल इस तरह की भूमिका में हैं डाकघर
फाइनैंस का बड़ा रोल
डाकघरों की विश्वसनीयता को ध्यान में रखकर सरकार में 1 सितंबर 2018 को इंडिया पोस्ट पेमंट बैंक (IPPB) शुरू किया। करीब 2 लाख पोस्टमैनों को स्मार्टफोन और बायोमेट्रिक डिवाइस मुहैया कराकर आम जनता के दरवाजे पर जाकर बैंकिंग सेवाएं देने की पहल काफी सफल रही। अब 1000 ATM के अलावा कोर बैंकिंग सर्विस दी जा रही हैं। डाकघरों में 13,354 आधार और 426 डाकघर पासपोर्ट सेवा सेंटर भी हैं। ई-कॉमर्स बाजार में भी भारतीय डाक ने प्रवेश कर क्षमता बढ़ाने की कोशिश की है।
कोरोना संकट में निभाया अहम रोल
देशभर में मेल डिलिवरी, पोस्ट ऑफिस सेविंग्स बैंक और जीवन बीमा समेत कई सेवाएं उन्होंने दरवाजे तक उपलब्ध कराने का काम किया। दवाओं की डिलिवरी के साथ वेंटिलेटर, कोविड-19 टेस्ट किट और दूसरे मेडिकल उपकरणों को कार्गो एयरलाइंस और अपनी मेल मोटर नेटवर्क की मदद से चुनिंदा जगहों तक पहुंचाया। लॉकडाउन में सारी ट्रांसपोर्ट सर्विस ठप थीं, बावजूद इसके 2.3 करोड़ सेविंग्स खातों से 33,000 करोड़ रुपये का ट्रांजेक्शन हुआ।
23 लाख आधार आधारित ट्रांजेक्शन से भी 452 करोड़ रुपये और 31.5 लाख मनीआर्डरों की 355 करोड़ रुपये की रकम बांटी गई। इंडिया पोस्ट पेमंट बैंक ने 2,600 करोड़ रुपये पहुंचाए। कई डाक कर्मचारी सर्विस देते समय मौत का शिकार बने। लॉकडाउन में इतिहास में पहली बार डाक विभाग ने अपने वाहनों के साथ 500 किमी. से ज्यादा लंबे 22 रास्तों का ऐसा तंत्र बनाया, जिससे जरूरी वस्तुओं की आवाजाही संभव हो सकी।
चिट्ठी-पत्री की दुनिया बदली
कभी चिट्ठियां ही संचार का सबसे ताकतवर साधन होती थीं। गलियों में डाकिए को देख अजीब रोमांच होता था। जिन घरों में ज्यादा चिट्ठियां आतीं, समाज में उनकी अलग हैसियत थी। तमाम लेखकों, राजनेताओं और जाने-माने लोगों की चिट्ठियों पर जाने कितना साहित्य लिखा गया है। 1854 में देश में सालाना 1.20 करोड़ चिट्ठियों की आवाजाही थी, जो 1985-86 तक बढ़कर 1198 करोड़ हो गई। संचार क्रांति की दस्तक के बाद भी सालाना 1550 करोड़ तक चिट्ठिय़ां आ रही थीं। बेशक चिट्ठियों के साम्राज्य को मोबाइल ने उजाड़ना शुरू किया। 2005-06 में चिट्ठियां घटते हुए 670 करोड़ रहगईं। बीते बरसों में स्पीड पोस्ट, बिजनेस पोस्ट समेत कई सर्विस में डाक की मात्रा बढ़ी है। सामान्य डाक गिरावट के बाद भी 447 करोड़ से ज्यादा है। इनमें पर्सनल चिट्ठियां नाममात्र की हैं। इसीलिए चिट्ठियों को बचाने की मुहिम जारी है। सरकार भी पत्र संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रतियोगिताएं करती है।
डाक की असली ताकतगांवों में
ग्रामीण इलाके ही भारतीय डाक की असली ताकतहैं। आजादी के बाद उदार सरकारी नीतियों के कारण गांवों की जरूरतों के हिसाब से अनूठे डाकघर खुले। कहीं नावों पर फेरी बोट पोस्ट ऑफिस, मोबाइल पोस्ट ऑफिस, पहाड़ी गांवों में टट्टू और खच्चरों पर डाकघर तो रेगिस्तानी इलाके में ऊंट डाकघर खुले। 1953 में कश्मीर में सैलानियों की सुविधा के लिए डल झील पर तैरता डाकघर खुला। ऐसे कई प्रयोग हुए जो सफल रहे।
कोरोना संकट में निभाया अहम रोल
देशभर में मेल डिलिवरी, पोस्ट ऑफिस सेविंग्स बैंक और जीवन बीमा समेत कई सेवाएं उन्होंने दरवाजे तक उपलब्ध कराने का काम किया। दवाओं की डिलिवरी के साथ वेंटिलेटर, कोविड-19 टेस्ट किट और दूसरे मेडिकल उपकरणों को कार्गो एयरलाइंस और अपनी मेल मोटर नेटवर्क की मदद से चुनिंदा जगहों तक पहुंचाया। लॉकडाउन में सारी ट्रांसपोर्ट सर्विस ठप थीं, बावजूद इसके 2.3 करोड़ सेविंग्स खातों से 33,000 करोड़ रुपये का ट्रांजेक्शन हुआ।23 लाख आधार आधारित ट्रांजेक्शन से भी 452 करोड़ रुपये और 31.5 लाख मनीआर्डरों की 355 करोड़ रुपये की रकम बांटी गई। इंडिया पोस्ट पेमंट बैंक ने 2,600 करोड़ रुपये पहुंचाए। कई डाक कर्मचारी सर्विस देते समय मौत का शिकार बने। लॉकडाउन में इतिहास में पहली बार डाक विभाग ने अपने वाहनों के साथ 500 किमी. से ज्यादा लंबे 22 रास्तों का ऐसा तंत्र बनाया, जिससे जरूरी वस्तुओं की आवाजाही संभव हो सकी।
चिट्ठी-पत्री की दुनिया बदली
कभी चिट्ठियां ही संचार का सबसे ताकतवर साधन होती थीं। गलियों में डाकिए को देख अजीब रोमांच होता था। जिन घरों में ज्यादा चिट्ठियां आतीं, समाज में उनकी अलग हैसियत थी। तमाम लेखकों, राजनेताओं और जाने-माने लोगों की चिट्ठियों पर जाने कितना साहित्य लिखा गया है। 1854 में देश में सालाना 1.20 करोड़ चिट्ठियों की आवाजाही थी, जो 1985-86 तक बढ़कर 1198 करोड़ हो गई। संचार क्रांति की दस्तक के बाद भी सालाना 1550 करोड़ तक चिट्ठिय़ां आ रही थीं। बेशक चिट्ठियों के साम्राज्य को मोबाइल ने उजाड़ना शुरू किया। 2005-06 में चिट्ठियां घटते हुए 670 करोड़ रहगईं। बीते बरसों में स्पीड पोस्ट, बिजनेस पोस्ट समेत कई सर्विस में डाक की मात्रा बढ़ी है। सामान्य डाक गिरावट के बाद भी 447 करोड़ से ज्यादा है। इनमें पर्सनल चिट्ठियां नाममात्र की हैं। इसीलिए चिट्ठियों को बचाने की मुहिम जारी है। सरकार भी पत्र संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रतियोगिताएं करती है।डाक की असली ताकतगांवों में
ग्रामीण इलाके ही भारतीय डाक की असली ताकतहैं। आजादी के बाद उदार सरकारी नीतियों के कारण गांवों की जरूरतों के हिसाब से अनूठे डाकघर खुले। कहीं नावों पर फेरी बोट पोस्ट ऑफिस, मोबाइल पोस्ट ऑफिस, पहाड़ी गांवों में टट्टू और खच्चरों पर डाकघर तो रेगिस्तानी इलाके में ऊंट डाकघर खुले। 1953 में कश्मीर में सैलानियों की सुविधा के लिए डल झील पर तैरता डाकघर खुला। ऐसे कई प्रयोग हुए जो सफल रहे।चुनौतियां भी कम नहीं
भारतीय डाक के सामने बहुत-सी चुनौतियां हैं। उसके बजट का 91 फीसदी हिस्सा वेतन और पेंशन पर खर्च होता है। वहीं डाक विभाग का रेवेन्यू आज के दौर में चुनौती भरा काम है। 2015-16 में इसका रेवेन्यू 12939.79 करोड रुपये और खर्च18946.97 करोड़ रुपये था। 2020-21 में कोरोना संकट के कारण रेवेन्यू घटकर 10632.31 करोड़ हुआ जबकि खर्च बढ़कर 28,327 हो गया। 2018-19 के बाद रेवेन्यू के मामले में इसके सामने काफी गंभीर चुनौती दिख रही है। डाक भवनों के लिए कई जगह प्लॉट खाली हैं। वहीं सालाना 106 करोड़रुपयेसे ज्यादा किराया डाक विभाग दे रहा है। भविष्य में भारतीय डाक अपनी सर्विस बढ़ाने के साथ जो उम्मीदे बांधे हुए है, उसके लिए अभी बहुत रकम के निवेश के साथ श्रम शक्ति बढ़ाने की दरकार है।
भारतीय डाक के सामने बहुत-सी चुनौतियां हैं। उसके बजट का 91 फीसदी हिस्सा वेतन और पेंशन पर खर्च होता है। वहीं डाक विभाग का रेवेन्यू आज के दौर में चुनौती भरा काम है। 2015-16 में इसका रेवेन्यू 12939.79 करोड रुपये और खर्च18946.97 करोड़ रुपये था। 2020-21 में कोरोना संकट के कारण रेवेन्यू घटकर 10632.31 करोड़ हुआ जबकि खर्च बढ़कर 28,327 हो गया। 2018-19 के बाद रेवेन्यू के मामले में इसके सामने काफी गंभीर चुनौती दिख रही है। डाक भवनों के लिए कई जगह प्लॉट खाली हैं। वहीं सालाना 106 करोड़रुपयेसे ज्यादा किराया डाक विभाग दे रहा है। भविष्य में भारतीय डाक अपनी सर्विस बढ़ाने के साथ जो उम्मीदे बांधे हुए है, उसके लिए अभी बहुत रकम के निवेश के साथ श्रम शक्ति बढ़ाने की दरकार है।











