केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30% तक करने का फैसला लिया गया है। इससे मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने की उम्मीद है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस कदम को पर्याप्त नहीं माना और कहा कि दवाओं की वास्तविक लागत और मरीजों से वसूली जाने वाली कीमत के बीच भारी अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
■ सुप्रीम कोर्ट केंद्र के फैसले से संतुष्ट नहीं, पूछा- 11 रुपये की सलाइन की बोतल 270 में क्यों बिक रही?
■ कोर्ट ने सरकार को 27 अक्टूबर तक दवाओं की कीमत नियंत्रित करने का तरीका बताने को कहा
■ कोर्ट ने सरकार को 27 अक्टूबर तक दवाओं की कीमत नियंत्रित करने का तरीका बताने को कहा
'कई गुना ज्यादा कीमत कैसे वसूलने दें'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बाजार में 11 रुपये की लागत वाली सलाइन 270 रुपये में बेची जा रही है। जस्टिस विक्रम नाथ ने सवाल किया कि परिवहन, कच्चे माल, रिसर्च और अन्य खर्चों को एमआरपी में शामिल करने के बावजूद वास्तविक लागत से कई गुना अधिक कीमत वसूलने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि भारत में दवाओं की कीमतें दुनिया में सबसे कम हैं और इसी वजह से बड़ी संख्या में लोग इलाज के लिए भारत आते हैं। लेकिन कोर्ट ने दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में भारी अंतर पर सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर को कैंसर की दवाओं कई गुना अधिक कीमत वसूलने पर गंभीर चिंता जताई थी।सरकार की दलील
जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि कार्डियक स्टेंट की कीमत करीब 5,000 रुपये है, जबकि 25,000 रुपये से अधिक में बेचते हैं। तुषार मेहता ने दलील दी कि दवाओं की कीमतों पर एक सीमा से आगे नियंत्रण लगाने से उनकी आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, क्योंकि ट्रेड मार्जिन से वितरण व्यवस्था को मदद मिलती है।महंगे इलाज से चिंता
- देश में इलाज पर बढ़ रहा खर्च बड़ी संख्या में लोगों को परेशान कर रहा है। केंद्र ने बताया कि कैंसर की दवाओं पर मार्जिन 30% तक सीमित करने से मरीजों के साल में 2,500 करोड़ रुपये बचेंगे।
- सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि सरकार अब दूसरी दवाओं की लागत और मुनाफे में बड़े अंतर को कम करे और अन्य इलाज भी सस्ता करे।
