मैं रंग हूँ,
मुझे बेरंग न कर,
मेरे उजास में अंधकार का
कभी प्रसंग न कर।
मैं हूँ लाल, प्रेम और साहस का प्रतीक,
पीला, शुभ्र ज्ञान का संगीत।
नीला, असीमित आसमान की छाँव,
हरा, जीवन देता मिट्टी का दान।
मैं ही इंद्रधनुष में खिलता,
प्रकृति का अद्भुत खेल रचता।
परिवर्तन के सत्य को हरदम,
स्नेह से जीवन में पिरोता।
फिर क्यों, हे मानव!
मेरे रंगों को सीमाओं में बाँधता?
धर्म, जाति, भाषा के नाम पर
मेरे अस्तित्व को संकुचित करता?
मैं प्रेम हूँ, सौहार्द्र हूँ,
हर भाव में रचा-बसा।
कभी उत्सव में बिखरता,
कभी अंबर पर निखरता।
जब मुझे कोई बाँटता है,
संकीर्णता की दीवारें खड़ी करता है,
मेरे हृदय पर आघात होता है,
मानवता का अस्तित्व धूमिल होता है।
क्या तुम भूल गए?
मैं ही जीवन का सार हूँ,
प्रकृति की कूची से निकला,
हर कण-कण में विस्तार हूँ।
नीली छतरी में लिपटा यह जग,
एक ही रंग से बंधा है।
जीवन-धारा में बहता रक्त,
हर तन-मन में एक सा बहता है।
तो क्यों बाँटते हो मुझे?
क्यों देते हो मुझे नई परिभाषाएँ?
मुझे मेरे स्वाभाविक स्वरूप में रहने दो,
मुझे प्रेम, समरसता और एकता में बहने दो।
मैं रंग हूँ, मुझे रंग ही रहने दो,
हर दिल में प्रेम के सुर गूँजने दो
~रचनाकार
सतपुड़ा सिंघम
प्रदीप वाल्मीकि
(मध्य प्रदेश)











