जस्टिस जी. एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की बेंच ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि सरकार की रिपोर्ट केवल 'कागजी खानापूर्ति' लगती है। इसमें यह पता लगाने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की गई कि SC/ST लाभार्थियों से उनकी जमीन गैर-कानूनी ढंग से छीनी गई है या नहीं।
पावर ऑफ अटॉर्नी और 'बटाईदारों' के खेल पर उठे सवाल
अदालत ने पाया कि सरकार ने गुना जिले के 139 भू-स्वामियों की कृषि भूमि पर 'बटाईदारों' (बटाई पर खेती करने वाले) द्वारा खेती किए जाने का दावा तो किया, लेकिन यह जांच ही नहीं की कि वे वैध किसान हैं या दबंगों ने जबरन जमीनों पर कब्जा कर रखा है।इसके अलावा, गैर-SC/ST व्यक्तियों के पक्ष में निष्पादित 'पावर ऑफ अटॉर्नी' के जरिये जमीनों के कब्जे और ट्रांसफर पर भी कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई। अदालत ने कलेक्टर से पूछा कि ऐसे समझौतों को कानूनी कैसे माना जा सकता है, जो आदिवासियों को उनकी ही जमीन से बेदखल करते हैं?
हाईकोर्ट के सख्त निर्देश और कलेक्टर से मांगे गए जवाब:
- बंधुआ मजदूरी पर एफिडेविट: कलेक्टर व्यक्तिगत हलफनामा देकर बताएं कि क्या जिले में बंधुआ मजदूरी का कोई मामला पकड़ा गया है और क्या किसी गैर-SC/ST व्यक्ति को आदिवासियों को बंधुआ बनाने के जुर्म में जेल भेजा गया है?
- बमोरी और आरोन तहसील का रिकॉर्ड: बमोरी और आरोन तहसील में जनजातीय समाज के लोगों को बांटे गए पट्टों और लीज का पूरा ब्योरा पेश किया जाए।
- मंडी का डेटा: कृषि उपज मंडी से 2024, 2025 और 2026 में फसल बेचने वाले आदिवासी किसानों की सही संख्या का डेटा जुटाकर कोर्ट में प्रस्तुत किया जाए।











