एएनआई से बातचीत में, डी शिवानंदन, जो मुंबई में संयुक्त पुलिस आयुक्त (क्राइम) (1998-2001) थे, उन्होंने कहा कि 'सत्या, कंपनी, डैडी, शूटआउट एट वडाला, शूटआउट एट लोखंडवाला जैसी फिल्में गैंगस्टरों की छवि सुधारने के लिए बनाई गई थीं। इन सभी पर उन्हीं लोगों ने पैसे लगाए थे।' राम गोपाल वर्मा की फिल्म कंपनी में मोहनलाल का रोल डी शिवानंदन पर बेस्ड था। उन्होंने यहां तक कहा कि 1970 के दशक की फिल्में, जैसे दीवार और मुकद्दर का सिकंदर भी उन्होंने ही बनवाईं।
गोविंदा ने कहा 'क्या करे.. नाचके आए हैं', IPS अफसर ने बताई तब की बात, जब अंडरवर्ल्ड के इशारे पर मजबूर था बॉलीवुड
साल 1990 के दशक में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री किसी हलचल से कम नहीं था। अंडरवर्ल्ड का बॉलीवुड पर पूरा कब्जा था और हर गुजरते साल के साथ, वे मेकर्स, निर्देशक और एक्टर्स पर अपनी पकड़ मजबूत करते जा रहे थे, जो सचमुच दाऊद इब्राहिम, अबू सलेम और उनके जैसे लोगों के इशारों पर नाच रहे थे। 1990 के दशक में ही राम गोपाल वर्मा जैसे फिल्ममेकर्स ने अंडरवर्ल्ड पर बनी फिल्में बनाना शुरू किया और 'सत्या' और 'कंपनी' जैसी फिल्मों को पहचान मिलनी शुरू हुई, लेकिन अगर उस दौर के पुलिस अधिकारी की बात मानी जाए, तो इन फिल्मों पर अंडरवर्ल्ड ने भी पैसे लगाए थे।
एएनआई से बातचीत में, डी शिवानंदन, जो मुंबई में संयुक्त पुलिस आयुक्त (क्राइम) (1998-2001) थे, उन्होंने कहा कि 'सत्या, कंपनी, डैडी, शूटआउट एट वडाला, शूटआउट एट लोखंडवाला जैसी फिल्में गैंगस्टरों की छवि सुधारने के लिए बनाई गई थीं। इन सभी पर उन्हीं लोगों ने पैसे लगाए थे।' राम गोपाल वर्मा की फिल्म कंपनी में मोहनलाल का रोल डी शिवानंदन पर बेस्ड था। उन्होंने यहां तक कहा कि 1970 के दशक की फिल्में, जैसे दीवार और मुकद्दर का सिकंदर भी उन्होंने ही बनवाईं।
एएनआई से बातचीत में, डी शिवानंदन, जो मुंबई में संयुक्त पुलिस आयुक्त (क्राइम) (1998-2001) थे, उन्होंने कहा कि 'सत्या, कंपनी, डैडी, शूटआउट एट वडाला, शूटआउट एट लोखंडवाला जैसी फिल्में गैंगस्टरों की छवि सुधारने के लिए बनाई गई थीं। इन सभी पर उन्हीं लोगों ने पैसे लगाए थे।' राम गोपाल वर्मा की फिल्म कंपनी में मोहनलाल का रोल डी शिवानंदन पर बेस्ड था। उन्होंने यहां तक कहा कि 1970 के दशक की फिल्में, जैसे दीवार और मुकद्दर का सिकंदर भी उन्होंने ही बनवाईं।











