छत्तीसगढ़ के कांकेर रियासतकालीन मेले में बीजेपी सांसद भोजराज नाग शामिल हुए। इस दौरान उनके शरीर में देवी विराजमान हो गईं। सांसद भोजराज नाग ने बताया कि बस्तर अंचल में मेला में क्षेत्र के देवी देवता शामिल होते हैं और मेला की शुरुआत करते हैं। उसी परंपरा के तहत कांकेर मेले में पहुंचा और मुझ पर देवी सवार हो गई।
सांसद नाग देवी-देवताओं के साथ कांकेर के राजमहल से मेलाभाठा मैदान पहुंचे थे। यहां एक खंभे को गले लगाने के बाद ढाई चक्कर परिक्रमा की जाती है और रियासतकालीन मेले की शुरुआत होती है। इस मेले में देवी-देवताओं को फूल पहनाने और उनकी सेवा करने की परंपरा है। राजकुमार के पूजा और निर्देश पर मेले की शुरुआत हुई है।
क्षेत्र में सुख समृद्धि और खुशहाली की कामना
राजकुमार आदित्य प्रताप देव ने कहा कि, हर साल की तरह कांकेर में रियासतकालीन मेले के दौरान सभी देवी देवता राजमहल पहुंचे, जिनका स्वागत कर मेला स्थल के लिए रवाना किया गया। मेला स्थल पर देवी-देवताओं की विनती कर क्षेत्र में सुख समृद्धि और खुशहाली के लिए कामना की गई।
मेले में हर साल पहुंचते हैं विदेश से सैलानी
कांकेर मेले में हर साल विदेश से भी सैलानी पहुंचते हैं। उनके रुकने के लिए राजमहल के कॉटेज में व्यवस्था की जाती है। कांकेर मेले में इस साल भी विदेशी पर्यटक पहुंचे हैं। बस्तर की परम्परा और उनके त्योहार को देख पर्यटक झूम उठे।
कांकेर मेले का इतिहास 200 वर्ष से भी पुराना
इस मेले की शुरुआत कांकेर रियासत में साल 1853 से 1903 तक रियासत करने वाले राजा नरहरदेव ने अपने शासनकाल में की थी। तब से टिकरापारा मैदान को मेलाभाठा कहा जाता है। आज भी राजपरिवार साल के पहले रविवार को वार्षिक मेला आयोजित करता है। इस दौरान फसलों की कटाई हो चुकी होती है। फसलों की बिक्री करने से किसानों के पास पैसे भी होते हैं, जिससे वे मेला में खरीदारी करते हैं।
इस मेले में कांकेर शहर के साथ शीतला माता और सैकड़ों देवी देवता शामिल होते हैं। कांकेर शहर के भंडारीपारा, शीतलापारा, माहुरबंदपारा, टिकरापारा, अन्नपूर्णापारा मोखला मांझी का ध्वज और आंगादेव लेकर राजमहल पहुंचते हैं।











