17 शहर, 40 लोकेशंस, 110 दिनों की शूटिंग और डिफेंस की मदद से बनी फिल्म

17 शहर, 40 लोकेशंस, 110 दिनों की शूटिंग और डिफेंस की मदद से बनी फिल्म

मेघना गुलजार और विक्की कौशल की हालिया रिलीज फिल्म सैम बहादुर ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा परफॉर्म किया है। फिल्म में दूसरे विश्व युद्ध से पहले के दौर से लेकर 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौर तक को स्क्रीन पर दिखाया गया है।

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इसमें एक्टर्स और मेकर्स के अलावा प्रोडक्शन डिजाइनर डिपार्टमेंट का भी अहम किरदार रहा। फिल्म के प्रोडक्शन डिजाइनर सुब्रत चक्रवर्ती और अमित रे ने मेकर्स उस दौर को प्रामाणिक तरीके से दिखाने की बड़ी जिम्मेदारी ली।

मेकर्स की तरफ से मिले थे क्लियर इंस्ट्रक्शंस
मेकर्स की ओर से दोनों डिजाइनर्स को क्लियर इंस्ट्रक्शंस मिले थे कि शूटिंग जिन लोकेशंस पर हो वो सैम मॉनेकशॉ के दौर की महसूस होनी चाहिए। बता दें कि सुब्रत और अमित की गिनती देश के नामचीन आर्ट डायरेक्टर और प्रोडक्शन डिजाइनर्स में होती है।

बर्मा का रेफरेंस खूब ढूंढा पर मिला नहीं
दैनिक भास्कर से खास बातचीत के दौरान दोनों ने बताया, ‘आजादी से पहले जब सैम मानेकशॉ ब्रिटिश आर्मी की तरफ से सेकेंड वर्ल्ड वॉर में लड़ रहे थे, उस दौर को क्रिएट करने के लिए लोकेशन ढूंढना बहुत मुश्किल रहा। वह वॉर बर्मा के खिलाफ था। उस दौर में बर्मा कैसा दिखता था इसका रेफरेंस हमने बहुत ढूंढा पर मिला नहीं।

फिर लोनावला में मिली बर्मा जैसी लोकेशन
हमने इस पर एक साल तक रिसर्च की। बर्मा गए, वहां हमने देश के कई इलाके खंगाले पर वहां भी हमें कोई बैटलफील्ड नहीं मिला। हमें एक बुक में उस दौर के बैटलफील्ड का रफ फोटो मिला था। उसके हिसाब से देखें तो वहां एक ब्रिज और दो पैगोडा हिल्स थे। हमें कई शहरों में ढूंढने के बाद भी बर्मा में वो जगह नहीं मिली। दिलचस्प बात यह रही कि वैसा ही लोकेशन हमें मुंबई से कुछ घंटों की दूरी पर स्थित लोनावला में मिला।’

मानेकशॉ के नाम पर डिफेंस ने खुलकर मदद की
सुब्रत और अमित ने इस फिल्म पर मिली डिफेंस की मदद का भी खास जिक्र किया है। उन्होंने बताया- ‘हमने इससे पहले भी भारतीय सेना और सैनिकों के शौर्य पर फिल्में की हैं। इससे पहले हमने ‘शेरशाह’ पर काम किया था। उस फिल्म में भी हमें सेना का पूरा सहयोग मिला था। मगर यहां ‘सैम मानेकशॉ’ के नाम पर डिफेंस की ओर से दिल खोलकर मदद मिली।

आर्मी ने मानेकशॉ के जमाने के हथियार भी उपलब्ध करवाए
हमें ऊटी से लेकर देश के जो बाकी डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज यानी DSSC थे, वहां भी शूट की परमिशन दे दी गई। यह संभवत: हिंदी फिल्मों के इतिहास में पहली बार हुआ होगा। इन लोकेशंस की हेल्प के चलते हमारी फिल्म प्रामाणिक हो सकी।

एक DSSC प्रांगण में तो मेकर्स को खुदाई करने तक की भी अनुमति दी गई। हमने उस कैंपस के मेन गेट का लुक चेंज करने के लिए वहां 7 फीट तक खुदाई की। मुझे नहीं लगता कि आर्मी ने कभी अपने कैंपस में किसी को भी यह सब करने दिया होगा।

एक और चीज पहली बार हुई, वो यह कि आर्मी की ओर से हमें सैम मानेकशॉ के जमाने में जो हथियार यूज होते थे, वह भी शूट करने के लिए मिले।’

विक्की सेट पर आते ही पूरी तरह सैम मानेकशॉ बन जाते थे
इसके अलावा मेकर्स फिल्म की शूटिंग के लिए ऊटी स्थित सैम मानेकशॉ के असल घर पर भी गए थे। सुब्रत बताते हैं, ‘वहां उनके फौज के जमाने के ट्रंक आज भी रखे हुए हैं। उनकी बेटी ने हमें वह सब दिखाया। इस दौरान विक्की कौशल भी हमारे साथ मौजूद थे। वो सैम मानकेशॉ की बेटी की बातें गंभीरता से सुनते रहे और इस किरदार की तैयारी करते रहे। विक्की सेट पर आने से पहले नॉर्मल विक्की की तरह रहते थे पर सेट पर आते ही वो विक्की की तरह नहीं बल्कि सैम मानेकशॉ की तरह ही बातें करते थे।’

15 से लेकर 17 करोड़ रहा प्रोडक्शन बजट
फिल्म के प्रोडक्शन बजट पर बात करते हुए सुब्रत ने कहा, ‘फिल्म में प्रोडक्शन डिजाइन का बजट तकरीबन 15 से लेकर 17 करोड़ के बीच होगा। यह पूरी फिल्म 17 शहर में 40 लोकेशंस पर 110 दिनों में शूट हुई है।

डायरेक्टर मेघना फिलहाल ब्रेक पर हैं। इसके बाद वो अपनी अगली फिल्म की शूटिंग शुरू करेंगी। उनकी अगली फिल्म भी कुछ इसी तरह की होने वाली है। वह भी खासी टाइम टेकिंग होगी।’

गुलजार साहब बोले- आर्काइव में रखी जाएगी यह फिल्म
मेघना के पिता गुलजार साहब का जिक्र करते हुए सुब्रत बताते हैं, ‘गुलजार साहब फिल्म की स्क्रीनिंग पर मौजूद थे। उन्होंने बेटी की तारीफ करते हुए कहा था कि सैम बहादुर जैसी फिल्में आर्काइव में रखी जाएंगी। ऐसी फिल्में सदियों में एक बार बनती हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की फिल्में बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के पैमाने से परे बनाई जाती हैं। स्क्रीनिंग के दौरान वो इस फिल्म को लास्ट क्रेडिट सीन तक देखते रहे। बाद में उन्होंने इस बात पर हैरानी भी जाहिर की कि इस फिल्म पर सैकड़ों लोगों ने मेहनत की है।’


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