पूरब अंग के उप-शास्त्रीय गायन में नदियों का वर्णन

पूरब अंग के उप-शास्त्रीय गायन में नदियों का वर्णन

सदानीरा समागम : भारत भवन के अंतरंग सभागार में प्रस्तुति

भोपाल। जल गंगा संवर्धन अभियान अंतर्गत सदानीरा समागम के अंतिम दिन भारत भवन के अंतरंग सभागार में रीता देव एवं पंडित भोलानाथ मिश्र के पूरब अंग के उप-शास्त्रीय गायन की प्रस्‍तुति हुई। भारतीय शास्त्रीय एवं उप-शास्त्रीय संगीत में पूरब अंग की गायकी की अनेक परंपराए प्रचलित है। जिसमें विशेष रूप से इसका उल्‍लेख किया जाता है। पूरब अंग की गायकी का प्रसार बनारस घराने से हुआ है। इस गायकी में नदी से जुड़ी कई बन्दिशें-ख्‍याल ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती, होरी, भजन आदि में दिखाई देती है। आज की इस प्रस्‍तुति में उन्‍होंने ठुमरी में मौरा सैंया बुलावे आधी रात नदिया बेरी भई सुनो रे मनाह हूँ तो तेरी चैरी नैया लगा दी जो पार...

इस ठुमरी में अभिसारिका नायिका की व्याकुलता सगुण तथा निगुण रूप से दिखाई पड़ती है। यहाँ नायिका का उद्देश्य अपने प्रभु को सम्बोधित करना है जो स्वयं साहित्य में नायक के रूप में उपस्थित है। ठुमरी आधारित युगल गायन प्रस्‍तुति में शिव स्‍तुति, यमुना व गंगा नदियों का वर्णन तथा श्रृंगार के अनेक पक्ष ध्‍वनित हुए।  

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