जानें पूरा मामला
यह पूरा मामला कर्नाटक के एक छोटे बिजली व्यापारी रमजान मुल्ला से जुड़ा है। साल 2016 में जब नोटबंदी हुई, तो उन्होंने अपने बैंक खातों में कुल 20.99 लाख रुपये जमा किए थे। रमजान के मुताबिक इस पैसे के दो हिस्से थे:- 8.73 लाख रुपये उनकी दुकान की नकद बिक्री यानी कमाई का पैसा था।
- 12.26 लाख रुपये उनके पांच बुजुर्ग रिश्तेदारों के थे। ये पुराने यानी नोटबंदी में बंद होने वाले नोट थे। उन बुजुर्गों के पास या तो बैंक खाता नहीं था या वे खुद बैंक जाने में असमर्थ थे। इसलिए उन्होंने पुराने नोट बदलने के लिए रमजान को दिए थे।
इनकम टैक्स से मिला नोटिस
चूंकि रमजान छोटे व्यापारी हैं और सरकार की प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन स्कीम (धारा 44AD) के तहत टैक्स भरते हैं। इसलिए उन्हें रोजमर्रा का पूरा बही-खाता रखने की जरूरत नहीं थी। फिर भी, अपनी बात को साबित करने के लिए उन्होंने सेल्स रजिस्टर, वैट रिटर्न, बैंक स्टेटमेंट और अपने उन पांचों रिश्तेदारों के लिखित शपथ पत्र (एफिडेविट) आयकर विभाग को सौंपे।आयकर अधिकारी (AO) इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुए। उनका मानना था कि कोई भी व्यक्ति अपने रिश्तेदारों के पुराने नोट अपने खाते में जमा नहीं कर सकता। विभाग ने रमजान के सभी सबूतों को खारिज करते हुए पूरे 20.99 लाख रुपये को 'अघोषित आय' मान लिया और भारी टैक्स का नोटिस थमा दिया।
आईटीएटी ने सुनाया बड़ा फैसला
जब रमजान ने इसके खिलाफ अपील की, तो बड़े अधिकारियों (CIT-A) ने थोड़ी राहत देते हुए बिजनेस के आधे पैसे को तो सही माना, लेकिन रिश्तेदारों के पूरे 12.26 लाख रुपये पर टैक्स के फैसले को सही ठहराया।इसके बाद यह मामला टैक्स कोर्ट यानी ITAT के पास पहुंचा। कोर्ट ने रमजान के सभी दस्तावेजों जैसे वैट रिटर्न और रिश्तेदारों के शपथ पत्रों को सही पाया। कोर्ट ने रमजान के पक्ष में फैसला सुनाते हुए आयकर विभाग द्वारा लगाई गई पूरी टैक्स डिमांड को रद्द कर दिया।











