भोपाल बायपास के रेलवे ओवरब्रिज (ROB) पर बड़े हादसे का खतरा मंडरा रहा है। दस दिन पहले जहां 100 मीटर सड़क धंसकर 20 फीट गहरा गड्ढा बन गया था, वहीं 300 मीटर अर्थ वॉल और पुल की संरचना दरारों से जर्जर है।
भास्कर की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि डेढ़ सौ से ज्यादा डंपर मिट्टी डालने के बाद भी न गड्ढा भरा, न सड़क बनी। उल्टा रिटेनिंग वॉल और स्लोप दोनों टूट चुके हैं।
मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम (MPRDC) के अफसर खुद मान रहे हैं कि अब पूरा हिस्सा ही खतरनाक है। जनरल मैनेजर सोनल सिन्हा ने कहा- अब जो भी काम करेंगे, वह पूरे हिस्से में ही होगा।
पहला खतरा- ब्रिज और वॉल में गैप भोपाल बायपास पर कल्याणपुर के पास रेलवे का ब्रिज गुजरा है। यह ब्रिज रेलवे ने बनाया है, जबकि इसके दोनों ओर करीब 400-400 मीटर लंबी रेनफोर्स्ड अर्थ वॉल एमपीआरडीसी ने साल 2013 में तैयार की थी। इसी अर्थ वॉल के कल्याणपुर की तरफ का 100 मीटर लंबा हिस्सा धंस गया था।
अब ब्रिज और वॉल को जोड़ने वाले पिलर में भी गैप आ गया है। पिलर तिरछा हो गया है। ऐसे में यह हिस्सा भी धंस सकता है।
दूसरा खतरा- रिटेनिंग वॉल टूटने लगी जिस तरफ से 100 मीटर हिस्सा धंसा था, उसकी रिटेनिंग वॉल भी टूटने लगी है। यह रिटेनिंग वॉल रेलवे ब्रिज के पास में ही है।
तीसरा खतरा- स्लोप में दरारें, भारी वाहनों से धंसेगी धंसे हिस्से के पास स्लोप के बाकी हिस्से में भी मिट्टी बैठ रही है। इस वजह से स्लोप पर दरारें आ गई हैं। यदि जर्जर हिस्से को ठीक कर भी दिया जाता है तो भविष्य में भारी वाहनों के दबाव में बाकी की रिटेनिंग वॉल भी धंस सकती है।
55 किमी की आधी सड़क पर गड्ढे, जीएम बोलीं- रिपेयर होंगे भोपाल बायपास बीओटी यानी, बिल्ट ऑपरेट और ट्रांसफर मॉडल पर बना था। आंध्र प्रदेश की कंपनी ट्रॉन्सट्राय प्राइवेट लिमिटेड ने इसे साल 2013 में बनाया था। इसकी कुल लंबाई करीब 55 किलोमीटर है। इसके एवज में कंपनी को 305 करोड़ रुपए मिले। 12 साल में कुल 650 करोड़ रुपए की टोल वसूली भी हो गई।
एक्सपर्ट के अनुसार, कंपनी ने रेनफोर्स्ड अर्थ वॉल (आरई वॉल) को तकनीकी मानकों के अनुसार नहीं बनाया। इस वजह से नीचे पानी भर रहा था। वहीं, 5 से 6 साल बीत जाने के बावजूद मेंटेनेंस भी नहीं हुआ।
एमपीआरडीसी के अफसरों का कहना है कि अनुबंध की शर्तों के अनुसार कंपनी ने समय पर प्रोजेक्ट पूरा नहीं किया। इस वजह से 2020 में कॉन्ट्रेक्ट रद्द कर दिया गया था। इससे पहले भी 2017 में कंपनी ब्लैकलिस्ट की गई थी। इसके बावजूद अफसरों ने ध्यान नहीं दिया।











