जंगल-पहाड़ों में बीता बचपन, चित्रकला कर्म में सृजन कर कमाया नाम

जंगल-पहाड़ों में बीता बचपन, चित्रकला कर्म में सृजन कर कमाया नाम
भोपाल। मप्र जनजातीय संग्रहालय में स्थापित 'लिखन्दरा प्रदर्शनी दीर्घा' में 43वीं शलाका चित्र प्रदर्शनी का शुभारंभ हुआ। भील समुदाय के चित्रकार दिलीप गणावा के चित्रों की प्रदर्शनी नवंबर माह के अंत तक सजी रहेगी। युवा चित्रकार दिलीप गणावा का जन्म मप्र के जनजातीय बहुल झाबुआ जिले के एक छोटे से ग्राम-नयागांव खालसा में हुआ, जो गुजरात सीमा से सटा हुआ है। जंगल-पहाड़ों के सानिध्य में उनका बचपन गुजरा। गांव में या उसके आसपास उस समय स्कूल न होने से शिक्षा से वंचित रहे।

अभावों में गुजरा बचपन

लगभग 45 वर्ष के इस भीली चित्रकार को अपनी जन्मतिथि की पुख्ता जानकारी नहीं है। उनका बचपन अभावों, कठिनाइयों के बीच गुजरा। वह विवाहित हैं और उनकी पत्नी भी भीली चित्रकला में पारंगत हैं। उनके तीन बच्चे हैं और आर्थिक अभावों के बावजूद बच्चों को पढ़ा-लिखा रहे हैं और भविष्य में उन्हें उच्च शिक्षा भी दिलाने की मंशा रखते हैं।

पद्मश्री भूरीबाई से मिली प्रेरणा

कुछ वर्ष पूर्व रोजगार की तलाश में जब भोपाल आये, तब पद्मश्री भूरीबाई के चित्रकर्म से अत्यन्त प्रेरित हुए और तभी चित्रकार बनने की मन में ठान ली। फिर प्रख्यात भीली चित्रकार अपनी बुआ गंगूबाई के सान्निध्य में लगभग आठ वर्षों तक चित्रकारी के गुर सीखे और उनके चित्रकला कार्यों में सहयोग किया, लेकिन फिर खेती-किसानी और पारिवारिक दायित्व के चलते वापस अपने गांव लौटना पड़ा।

गंगूबाई से सीखकर कलापक्ष को बनाया सुघड़

वर्तमान में वह अपने गांव में रहकर ही चित्रकला कर्म में निरंतर सृजनरत हैं। उन्होंने राजधानी दिल्ली, भोपाल, जयपुर, उदयपुर सहित कई जगहों पर चित्रकला प्रदर्शनियों में हिस्सा लिया और विभिन्न कला संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी हैं। वह अपनी सफलता का सम्पूर्ण श्रेय गंगूबाई को देते हैं, जिनके मार्गदर्शन ने कलापक्ष को और सुघड़ बनाने में मदद की। दिलीप के चित्रों में पशु-पक्षी, पेड़-पौधे एवं अपने आस-पड़ोस के वातावरण की झलक प्रमुखता से दिखाई देती है।

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