'ये ईसाइयों पर हमला', भारत के FCRA बिल से ट्रंप की पार्टी के सांसद राइली मूर आगबबूला, बोले- बिगड़ सकते हैं अमेरिका से रिश्ते

'ये ईसाइयों पर हमला', भारत के FCRA बिल से ट्रंप की पार्टी के सांसद राइली मूर आगबबूला, बोले- बिगड़ सकते हैं अमेरिका से रिश्ते
वॉशिंगटन: भारत सरकार के फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट (FCRA) में बदलाव के प्रस्ताव की अमेरिकी कांग्रेसमैन राइली मूर ने आलोचना की है। उन्होंने कहा कि ये सीधे-सीधे ईसाईयों को निशाना बनाने की कोशिश है। उन्होंने यहां तक कहा है कि यह मुद्दा भारत और अमेरिका के रिश्तों में तनाव की वजह बन सकता है। मूर ने कहा कि प्रस्तावित बदलाव NGO, ट्रस्ट, शिक्षण संस्थानों और धार्मिक संगठनों को मिलने वाले विदेशी चंदे से जुड़े है, जो भारत सरकार को चर्चों का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की इजाजत देंगे।

संसद के मॉनसून सत्र के दौरान 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026' पर बहस के बीच मंगलवार को मूर ने एक्स पर इसके बारे में पोस्ट की है। डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद राइली मूर ने FCRA में प्रस्तावित बदलावों को ईसाईयों पर सीधा हमला बताते हुए आरोप लगाया कि इस कानून से सरकार चर्चों और धार्मिक चैरिटीज पर 'कब्जा' कर सकती है।

भारत में ईसाईयों का पुराना इतिहास

अमेरिकी कांग्रेसमैन ने एक्स पोस्ट में भारत में ईसाई धर्म के लंबे इतिहास का जिक्र किया। उन्होंने कहा, 'यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद सेंट थॉमस द एपोसल मालाबार तट पर आए थे, तब से ईसाई भारत में हैं। ईसाई धर्म के इतने लंबे इतिहास के बावजूद, भारतीय संसद FCRA नियमों में बदलाव करने पर विचार कर रही है।

राइली मूर ने सीधेतौर पर आरोप लगाया कि FCRA नियमों में बदलाव के पीछे सरकार की मंशा चर्चों का नियंत्रण अपने हाथ में लेना है। ऐसे में यह ईसाईयों पर सीधा हमला है। बिल इसी तरह आगे बढ़ता है और कानून बनता है तो फिर यह भारत के साथ हमारे (अमेरिका के) द्विपक्षीय संबंधों में बड़ी चिंता का विषय बन जाएगा।

FCRA बिल में क्या है?

इस बिल का मकसद फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट, 2010 में बदलाव करना है। यह कानून तय करता है कि गैर-सरकारी संगठन (NGO), चैरिटेबल ट्रस्ट, शिक्षण संस्थान, धार्मिक संस्थाएं और एसोसिएशन विदेशी चंदा कैसे ले सकते हैं और उसका इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं। मौजूदा नियमों के तहत संगठनों को विदेशी चंदा लेने से पहले गृह मंत्रालय से रजिस्ट्रेशन कराना होता है, जो पांच साल में रिन्यू होता है।

बिल के साथ दिए गए बैकग्राउंड नोट के मुताबिक, 15 जुलाई 2026 तक भारत में 14,449 एक्टिव FCRA रजिस्ट्रेशन थे। इसके अलावा 22,498 रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिए गए थे, जबकि 15,212 की समय-सीमा खत्म हो गई थी। 2019 और 2022 के बीच इस एक्ट के तहत रजिस्टर्ड संगठनों को 55,741 करोड़ रुपए का विदेशी चंदा मिला है।

बिल के अहम बिंदु

बिल के सबसे अहम प्रस्तावों में से एक है केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक 'डेजिग्नेटेड अथॉरिटी' (अधिकृत संस्था) बनाना। अगर किसी संगठन का FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाता है, सरेंडर कर दिया जाता है या रिन्यू नहीं होता है तो इस अथॉरिटी के पास विदेशी चंदे और उससे बनाई गई संपत्तियों का मैनेजमेंट अपने हाथ में लेने की ताकत होगी।

बिल में रिन्यूअल के लिए विदेशी चंदे के इस्तेमाल की न्यूनतम सीमा है। जिन संगठनों को पिछले दो फाइनेंशियल ईयर में 10 लाख रुपए से कम विदेशी चंदा मिला है, वह रिन्यूअल के योग्य नहीं होंगे। विदेशी चंदे को दूसरे संगठनों को ट्रांसफर करने पर पाबंदियां, विदेशी फंड लेने और इस्तेमाल करने के लिए सख्त समय-सीमा का भी प्रावधान किया गया है।

बिल पर विवाद क्यों है?

बिल में 'डेजिग्नेटेड अथॉरिटी' को दी जाने वाली प्रस्तावित शक्तियां बहस का केंद्र बन गई हैं। अमेरिकी सांसद मूर के अलावा कई NGO और सिविल सोसाइटी ग्रुप का तर्क है कि इन बदलावों से केंद्र को विदेशी फंडिंग पर निर्भर संगठनों पर बहुत ज्यादा कंट्रोल मिल जाएगा।

चर्च और धार्मिक संगठनों ने खास तौर पर चिंता जताई है कि विदेशी चंदे से दशकों में बनाए गए स्कूल, अस्पताल, कल्याणकारी संस्थान और अन्य संपत्तियां सरकार के कंट्रोल में आ सकती हैं। अगर उनके रजिस्ट्रेशन की समय-सीमा खत्म हो जाती है या वे रद्द हो जाते हैं।
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