अधिवक्ता के अनुसार, वकील अहमद एवं उनके बाद उनके वारिस लंबे समय से उक्त भूमि पर काबिज रहे और उससे लाभ लेते रहे। दान से संबंधित प्रविष्टि राजस्व अभिलेखों में दर्ज है। वर्ष 1955 में भूमि का नामांतरण वकील अहमद के नाम हुआ था। 16 अगस्त 1994 को उनके निधन के बाद वादी पक्ष ने स्वयं को वैध उत्तराधिकारी बताते हुए दावा किया।
यह वाद अकील अहमद, परवेज अहमद और शकील अहमद द्वारा प्रस्तुत किया गया था, लेकिन न्यायालय में वे अपने दावे के समर्थन में ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके। अदालत ने तीन आधारों पर याचिका खारिज की। पहला, दान से संबंधित कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया। दूसरा, याचिका निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के लगभग 19 महीने बाद दाखिल की गई। तीसरा, उपलब्ध राजस्व अभिलेखों और दस्तावेजों के अनुसार भूमि सैफ अली खान एवं अन्य वारिसों की वैध संपत्ति पाई गई।
गौरतलब है कि वर्ष 1998 में नवाब मंसूर अली खान पटौदी और उनके परिवार ने इस भूमि के एक हिस्से को बिल्डर को विक्रय किया था। इससे पहले पारिवारिक बंटवारा भी हो चुका था, जिसके बाद यह विवाद न्यायालय तक पहुंचा।











