आज हम राजकुमार हिरानी की डायरेक्शन वाली शाहरुख खान की फिल्म डंकी का रिव्यू करेंगे। फिल्म की लेंथ 2 घंटे 41 मिनट है।
फिल्म की कहानी क्या है?
फिल्म की कहानी पंजाब के एक गांव लाल्टू की है। वहां के कुछ युवा तंगहाली से परेशान हैं। उनका सपना लंदन जाकर पैसे कमाना है। हालांकि, गरीब घर से होने और अंग्रेजी न आने की वजह से उन्हें वीजा नहीं मिलता है।
थक हारकर वे गैरकानूनी तरीके से लंदन जाने की तैयारी करते हैं। एक फौजी के रूप में शाहरुख खान इस गांव में आते हैं और इन बेसहारा युवाओं के रहनुमा बनते हैं। फिल्म में शाहरुख के किरदार का नाम हार्डी है। हार्डी लंदन जाने वाले तीन-चार लोगों के ग्रुप का लीडर बनता है। वो सड़क और समुंद्र मार्ग से अपने लोगों को लेकर लक्ष्य की तरफ निकल पड़ता है। अब लंदन जाने के बीच क्या-क्या दिक्कतें आती हैं, पूरी स्टोरीलाइन इसी पर बेस्ड है।
स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है?
इस फिल्म में आपको पठान और जवान वाले शाहरुख खान नजर नहीं आएंगे। फिल्म का बैकग्राउंड पंजाबी है, लेकिन एक पंजाबी लड़के हार्डी के रोल में उनका रोल कुछ खास नहीं लगा है। सपोर्टिंग एक्टर्स अनिल ग्रोवर और विक्रम कोच्चर का काम जरूर जबरदस्त है।
ये दोनों एक्टर्स इस फिल्म के सरप्राइज एलिमेंट हैं। फर्स्ट हाफ में इन दोनों की कॉमिक टाइमिंग आपको पेट पकड़कर हंसने पर मजबूर कर देगी। विक्की कौशल का कैमियो भी तारीफ के लायक है। तापसी पन्नू ने अपने रोल के हिसाब से ठीक-ठाक काम किया है।
डायरेक्शन कैसा है?
राजकुमार हिरानी की फिल्मों में अक्सर कुछ नया देखने को मिलता है। उनका सक्सेस रेट भी 100 फीसदी है। हालांकि, डंकी उनकी अब तक की सबसे कमजोर फिल्म मालूम पड़ती है। फिल्म का फर्स्ट हाफ तो एंटरटेनिंग है, लेकिन सेकेंड हाफ में कहानी को बहुत खींचा गया है।
डंकी के कुछ सीन ऐसे हैं, जिसे देखकर आपको हिरानी की पिछली फिल्में 3 इडियट्स और पीके की याद आएगी। फिल्म के कई सीन्स 3 इडियट्स से इंस्पायर्ड लगते हैं। हिरानी जैसे डायरेक्टर से ऑडियंस हमेशा कुछ नए की उम्मीद रखती है।
हां, एक बात जरूर है कि यह फिल्म एक ऐसे मुद्दे पर बनी है, जिस पर शायद पहले बात नहीं हुई है। इसके लिए हिरानी को जरूर पूरे नंबर मिलने चाहिए।
म्यूजिक कैसा है?
शाहरुख खान की फिल्मों में गाने अक्सर चार्टबस्टर में शामिल होते हैं। इस फिल्म में ऐसे एक भी गाने नहीं हैं। फिल्म के गाने अलग से सुनने लायक नहीं हैं। अरिजीत सिंह की आवाज में एक गाना 'माही' जरूर सुनने में अच्छा लगता है।
फिल्म का पॉजिटिव पॉइंट
सपोर्टिंग एक्टर्स की कलाकारी इस फिल्म का सबसे पॉजिटिव पॉइंट है। विक्रम कोच्चर और सुनील ग्रोवर के भाई अनिल ग्रोवर का स्क्रीन प्रेजेंस आपको हर वक्त गुदगुदाएगा। फिल्म का टॉपिक भी अच्छा है। फिल्म में एक अहम संदेश को बहुत मनोरंजक तरीके से पेश किया गया है। फर्स्ट हाफ में राजू हिरानी ने स्क्रीनप्ले को बांधे रखा है।
फिल्म का निगेटिव पॉइंट
सेकेंड हाफ बिल्कुल बोरिंग कर दिया है। भारत से लंदन जाने वाले सीक्वेंस को थोड़ा और दिलचस्प बनाया जा सकता था। कुछ सीन्स को और इंटेंस बनाते तो अच्छा होता। इस फिल्म में एक भी एक ऐसे गाने नहीं हैं, जिसे गुनगुनाया जा सके। गानों के मामले में शाहरुख की पिछली दोनों फिल्में बेहतर रही थीं। हिरानी की फिल्मों में पंचलाइंस कमाल के होते हैं। हालांकि इस बार ऐसा नहीं है। बस एकाध डायलॉग ऐसे हैं जो थोड़े हैवी लगते हैं।
जैसे एक सीन में शाहरुख कहते हैं- जब अंग्रेज हमारे देश भारत आए थे तो किसी ने पूछा था कि उन्हें हिंदी आती है कि नहीं..फिर लंदन जाने के लिए हमें अंग्रेजी आना क्यों जरूरी है?
फाइनल वर्डिक्ट, देखें या नहीं?
अगर आप पठान और जवान जैसी उम्मीद लगाए थिएटर जा रहे हैं तो जरूर निराशा मिलेगी। यह फिल्म राजकुमार हिरानी की पिछली फिल्मों के स्टैंडर्ड को मैच नहीं करती। अगर आप इस हफ्ते फैमिली के साथ कोई फिल्म प्लान कर रहे हैं, तो इसके लिए जरूर एक बार जा सकते हैं।
फिल्म में एक अहम सूचना भी दी गई है। सालों पहले लोग वीजा के अभाव में कैसे विदेश पहुंचते थे, उनका स्ट्रगल क्या होता है। इस फिल्म में इन सारे पहलुओं को एंटरटेनिंग अंदाज में दिखाया गया है।
क्या होता है डंकी रूट?
लोग जब गैरकानूनी रूप से बिना वीजा और पासपोर्ट विदेश की यात्रा करते हैं, वहां तक जाने के लिए जिस मार्ग का इस्तेमाल करते हैं, उसे डंकी रूट कहते हैं। मान लीजिए कि आपके पास पासपोर्ट और वीजा नहीं है, इस दशा में आप किसी भी कीमत में देश से बाहर (कुछ अपवादों को छोड़कर) नहीं जा सकते।
कुछ ऐसी फ्रॉड कंपनियां होती हैं जो यात्रियों को बिना किसी डाक्यूमेंट्स के इन देशों में पहुंचाने का काम करती हैं। इसके बदले वो मोटी रकम भी ऐंठती हैं। ये कंपनियां लोगों को हवाई मार्ग से न भेजकर सड़क और समुद्री रास्तों से भेजती हैं।
हर देश में इनके एजेंट भी मौजूद रहते हैं। वो गैरकानूनी रूप से यात्रा करने वाले लोगों को ट्रकों, शिप और कंटेनर में भरकर एक देश से दूसरे देश का बॉर्डर पार कराती हैं। ऐसी यात्राएं कई दिनों तक चलती हैं। कई लोग बीच रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। फिल्म डंकी इस मुद्दे पर ध्यान आकर्षित कराती है।











